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भारत में जो लोग विश्वकुटम्बकम् का नारा देते हैं, वे पूरी दुनिया को मूर्ख बनाते हैं, और अपने पड़ोसियों की तरक्की से जलते हैं, अगर भारत में कोई बड़ी दुर्घटना हुयी तो पूरी दुनिया ने उसका विरोध किया , अगर रूस में कोई दुइर्घटना हुयी तो पूरी दुनिया में उसका विरोध हुआ, दुनिया के जो लोग चित भी अपनी और पट भी अपनी के सिद्धांत पर बात करते हैं वे पूरी दुनिया और जिस देश में रहते हैं उन्हें और अपने आस पड़ोस में रहने वाले लोगों को मूर्ख बनाते रहते हैं, भारत के सोशलिस्टों ने अगर रूस में ब्लादीमिर लेनिन के सव को दफनाने का विरोध किया है तो यह उनके विस्तृत सोच की महानता है, जब १९१७ की समाजवादी क्रांति के पश्चात लेनिन ने बहुमत के आदेश से सत्ता संभाली तो उसी सासन काल में लेनिन की मृत्यु हुए और उस सासन ने उनके सव को एक सुरक्षित ममी की धरोहर के रूप में दुनिया में एक नया इतिहास बनाने के लिए राखी है तो वर्तमान सत्ता को विरोध क्यों और अगर भारत में उसका विरोध हुआ हैं तो सीमित सोच के लोग सोशलिस्ट सेंटर ऑफ़ इंडिया के कार्यकर्ताओं के कार्य par ब्यंग क्यों कर रहे हैं, अरे नादानों अगर आप यही कहते हो तो सदियों से शोसक सम्राटों ने इस देश के कमजोरों, निर्धनों , पिछड़ों और दलितों को सदियों से लूटा है तो क्या उनके महल किले तमाम रहने चाहिए ? क्यों उनको आप याद करते हो, मैं जब उन किलों में देखने जाता हूँ तो अंदर जाकर समझने लगता हूँ और सदियों से चलते उनके जुल्मो की फिल्म सी अंतर्मन में दौड़ने सुरु हो जाती है कि आज से सैकड़ों साल पहले हमारे पूर्वज, यहां गुलामों की हैसियत से आते थे और सर झुका कर इन महलों में रहने वाले लुटेरों के अगले आदेश का इन्तजार करते थे, की उस गुलाम की गर्दन काटने का आदेश होगा या सौ कोड़े खाने का आदेश, फासिस्ट राजा के सामंत राज्य में जिस किसी की कन्या या औरत को पसंद करते थे उसके पति और पिता या उस परिवार के पुरुषों को अपराध में फंसा कर मौत की सजा दे देते थे या आजीवन जेलों की सलाखों में डाल देते थे, , और उसकी औरत या पुत्री को अपनी गुलाम दासी बना कर उसका जब तक वह जवान है शारीरिक भोग और मानसिक शोसन करते रहते थे , ऐसा ही सिद्धांत था, सदियों से दुनिया में चल रहे , फासिस्ट और तानासाही राजतंत्र का ?? कैसा रहा होगा वह वक्त, अपनी बुद्धि में जोर डालने का प्रयास अवस्य करो ??. क्योंकि इस धरती का कोई भी राजतंत्र समानता बंधुता और एकता की बात नहीं करता था , उसका सिद्धांत था शोषण करना राजतंत्र का मूल सिद्धांत था , गुलाम और मालिक, ताकतवर मालिक और कमजोर गुलाम , हमने इतिहास में पड़ा भी है कि उस काल में उनके राज्य में धर्म गुरु होता था , और भारत में धर्म गुरु ब्राह्मणवादी ही हुआ करता था , उसने राजा की एक परिभासा भी बनायी हुयी थी , जो कि इतिहास के मुताबिक़ प्रचलित थी, कि राजा भगवान का भेजा हुआ प्रतिनिधि है , और उसका आदेश भगवान का आदेश माना जाएगा और उसी सिद्धांत से वह समाज को मूर्ख बनाते फिरते थे , उस काल के राजाओं के साम्राज्य और राज्य इसी प्रकार से चलते थे, जो उनका आदेश नहीं मानता था, उन्हें मृत्यु , कोड़े, और भयंकर aur कष्टप्रद और यातना भरी जेलों में गल गल और सड़ सड़ कर मरना पड़ता था ?? आज जो उक्त विचारों को ब्यक्त कर रहा है वह कुंठित विचारों का और संकीर्ण मानसिकता का ब्यक्ति है ???

के द्वारा:

हिन्दू संगठनो ने जन्तर मन्तर पर अन्ना हजारे के विरोध में प्रदर्शन किया धर्मरक्षक श्री दारा सेना के अध्यक्ष श्री मुकेश जैन के नेतृत्व मे हिन्दू संगठनो ने जन्तर मन्तर पर अन्ना हजारे के विरोध में प्रदर्शन किया। प्रदर्शन कारी नारे लगा रहे थे- दारा सेना - जिन्दाबाद, शातिर अन्ना हजारे -मुर्दाबाद, आतंकवादी अमेरीकी मिश्निरी की चण्डाल चैकड़ी का सरगना-शातिर अन्ना हजारे मुर्दाबाद, अन्ना का कमाण्डर उल्फा का ईसाई आतंकवादी अखिल गोगई - मुर्दाबाद, नक्सली आतंकवादी अग्निवेश -मुर्दाबाद। धर्मरक्षक श्री दारा सेना के साथ अखिल भारत हिन्दू महासभा,,बिहारी भाई सुरक्षा समिति ,खटिक चर्मकार बाल्मिकी धर्मरक्षक सेना, बाबा अमरनाथ तीर्थ यात्री महासंघ, पूर्वोत्तर शहीद सैनिक परिजन संघ, संविधान रक्षक साधू समाज आदि हिन्दू संगठनो ने जन्तर मन्तर पर अन्ना हजारे के विरोध में प्रदर्शन किया । इस अवसर पर प्रदर्शन कारियों को संबोधित करते हुए दारा सेना के अध्यक्ष श्री मुकेश जैन ने कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी और प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह की अन्ना मामले में अमेरीकी ताकतों द्वारा देश को अस्थिर करने की साजिश को सही बताया। श्री मुकेश जैन ने कहा कि कुछ ही साल पहले अमेरीका ने कैसे रासायनिक हथियारों का झूठा मामला खड़ा करके भारत के नजदीकी और मित्र देश इराक को नेस्तनाबूत करके गुलाम बना लिया। और आज अमेरीका अफगानिस्तान पर कब्जा करके हमारे सिर पर बैठ गया है। श्री मुकेश जैन ने देश वासियों को अन्ना की देश को अस्थिर करने की साजिश से सावधान रहने की अपील करते हुए कहा कि कल देश अमेरीका का गुलाम होता है तो जयचन्द और मीरजाफर की लिस्ट में एक और नाम होगा शातिर अन्ना हजारे। श्री मुकेश जैन ने भाजपा नेता एम वेंकैया नायडू की आलोचना करते हुए कहा कि शातिर अन्ना के साथ जुड़े अग्निवेश,पी वी राजगोपाल और अखिल गोगई जैसे देश के दुश्मन आतंकवादी शायद भाजपा नेता वेंकैया नायडू जानबूझ कर नहीं देख रहे हैं। उन्हें मालूम होना चाहिये कि अग्निवेश को उन्हीं की छत्तीसगढ़ सरकार ने कट्टर नक्सली आतंकवादी सबूतों के साथ बताया।अखिल गोगई के बारे में असम सरकार के मुख्य मंत्री तरूण गोगई का कहना है कि यह उल्फा का कट्टर आतंकवादी हैं। मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह के अनुसार पी वी राजगोपाल नक्सली आतंकवादी है।इस नक्सली ईसाई आतंकवादी की पत्नि कनाड़ा की ईसाई है। पति पत्नि दोनों को आतंकवादी अंगेज मिश्निरियों का आर्शीवाद प्राप्त है।नक्सली इसाई आतंकवादी पी वी राजगोपाल अपने 25000 नक्सली ईसाई आतंकवादियों को लेकर 4 साल पहले दिल्ली में आने की रिहर्सल भी कर चुका है। इन आतंकवादी गिरोहों को अन्तरराष्ट्रीय और अमेरीकी चर्च मदद करते हैं ये भी भारत सरकार ने 10 दिसम्बर 96 और 5 मई 1954 को संसद के बताया था। इस अवसर पर बिहारी भाई सुरक्षा समिति की अघ्यक्षा श्रीमति रेणु गुप्ता ने कहा कि बिहारियों को असम में जान से मारने वाले उल्फा के ईसाई आतंकवादी अखिल गोगई के समर्थक अन्ना हजारे का सभी बिहारी भाई विरोध करें।

के द्वारा:

के द्वारा:

धर्मरक्षक श्री दारा सेना 77 खेड़ाखूर्द, दिल्ली -110082 दूरभाष .9212023514 प्रेस विज्ञप्ति 27-7-11 रोमन कैथेलिक चर्च के इसाई आतंकवाद के खिलाफ याचिका सर्वोच्च न्यायालय में लगायी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री चन्द्रप्रकाश कौशिक के नेतृत्व में धर्मरक्षक श्री दारा सेना,के अध्यक्ष श्री मुकेश जैन ने इसाई आतंकवाद पूर्वोत्तर शहीद सैनिक परिजन संघ,,खटिक चर्मकार बाल्मिकी धर्मरक्षक सेना,,हिन्दू पत्रकार व बुद्धिजीवी मच के नेताओं के साथ मिलकर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश महोदय को जन हित याचिका के रूप में प्रार्थना पत्र दिया। और चर्च के पूर्वोत्तर के इसाई आतंकवाद और नक्सली माओवादी कहे जा रहे ईसाई आतंकवाद की पोल खोलते हुए उसके विनाश की मांग की। सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गयी इस याचिका में बताया गया है कि पूर्वोत्तर के ईसाई आतंकवादी गिरोहों ने वहां के हिन्दुओं का जीना मुश्किल कर रखा हैं ा न्यायालय रोमन कैथोलिक चर्च के इसाई आतंवादियों द्वारा की जा रही लाखों सैनिको व नागरिकों की निर्मम हत्याओं पर और इसाईयत न अपनाने पर जान से मारना और इसाईयत न अपनाने पर बलात्कार करना व डायन बताकर जान से मारने पर स्वयं सज्ञान लेकर देशधर्म की रक्षा करे। याचिका कत्र्ताओं ने रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा अरूणाचल प्रदेश में वहां के जनजातिय हिन्दुओं को ए के 47 के बल पर जबरदस्ती इसाई बनाने और इसाई न बनने पर जिन्दा जलानें ,मदिर व मठों को तोड़ने और मुख्यमंत्री जी तक का अपहरण करने व उनके परिवार को जान से मारने तक का ब्योरा सबूतों के साथ दिया है। याचिका कत्र्ताओं ने याचिका में लिखा कि रोमन कैथोलिक चर्च के मंसूबे भारत के नागरिकों व सैनिको की लाशो के ढेर लगाकर उनका पूरा सफाया करना और भारत की संप्रभुता को टुकड़े टुकड़े कर के एक अलग ईसाई देश बनाने के है।इसी माह की 9 तारीख में 20 लाख सूडानी मुस्लिमों की लाश पर बने दक्षिण सूडान नामक ईसाई देश से हमें सबक लेकर भारत की संप्रभुता को बचाने और और भारत की महान संस्कृति को बचाने और उसके नागरिकों की जान की रक्षा करने के लिये कदम उठाने चाहिये। विदेशो से आ रहे खरबों डालर का इस्तेमाल हिन्दुओं का धर्म भ्रष्ट करके उन्हें इसाई आतंकवादी बनाकर भारत सरकार से युद्ध करने और हजारों सैनिकों को मारने में होने का उल्लेख भी याचिका में किया गया है। 18 अप्रैल 2000 को बैपटिस्ट चर्च के एक पादरी व उसके 2 इसाई आतंकवादियों से 50 किलो आर डी एक्स गोला बारूद भी त्रिपुरा सरकार ने बरामद करके गिरफ्तार किया इसके सबूत भी याचिका में दिये गये हैं। याचिका में मांग की गयी है कि सर्वोच्च न्यायालय सरकार को आदेश दे कि सरकार जनवरी महा मेें मेघालय में इसाईयों द्वारा ध्वस्त किये गये हिन्दू मन्दिरों का पुनः निर्माण करवाये और हिन्दुओं के जलाये गये सभी घरों को तुरन्त बनवाये। इसी के साथ इसाईयों द्वारा मारे गये 30 हिन्दुओं के परिवारों को बीस.बीस लाख रूपये मुआवजे के दिलवाये। और बैपटिस्ट चर्च को आतंकवादी संगठन करार दे। याचिका में मांग है कि सर्वोच्च न्यायालय सरकार को आदेश दे कि सरकार पूर्वोत्तर के इसाई आतंकवादियों व अन्य राज्यों के नक्सली ईसाई आतंकवादियों से बात.चीत का रास्ता अख्तयार करना छोड़कर इन इसाई आतंकवादियों को बमों और गोलियों से भूनकर रख दे। और इनके सभी आतंकवादी अड्डे जिन्हें इन्होंने चर्च अनाथालय अस्पताल इसाई स्कूल का छदम् रूप देकर अपनी पनाहस्थली बना रखा है उन्हें भी नष्ट करें। जैसे कि श्रीलंका सरकार ने लिठ्ठे प्रमुख प्रभाकरण नामक इसाई आतंकवादी का विनाश किया था। प्रेस सचिव

के द्वारा:

आदरणीय सुरेश भाई, आपके लेख FB पर और आपके ब्लॉग पर जा कर पढता था, जानकारी थी आप इस मंच पर भी हैं किन्तु चूंकि मैं यहाँ कुछ समय पूर्व ही आया इसलिए इस पटल पर आपकी लेखनी की सशक्त ध्वनि से पहली बार सरोकार हो रहा है| एक सशक्त और तार्किक लेख प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक धन्यवाद| इस विषय को junction forum का मुद्दा बनाये जाने से पहले हीइस विषय पर मैंने यहाँ एक लेख लिखा था "हिन्दू निशाने पर: एक नंगा सच" उसमे मैंने मीडिया की जिस दोगली चाल को सन्दर्भ बनाया वो आज यहाँ पुनः स्पष्ट हो रही है| लाख सवाल के बाद भी निशानों परर मंदिर और मंदिर संपत्ति ही है मस्जिद वक्फ चर्च का नाम लेने का साहस नहीं हो पा रहा है..........

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

सुरेश जी अभिवादन .. गाँधी जी ने न तो आन्दोलन को हाईजैक किया न ही वे राष्ट्रपिता बन बैठे थे.. बल्कि उन्होंने ही कांग्रेस के सतही सम्मेलनों को एक व्यवस्थित दिशा दी और आन्दोलन से आम व्यक्ति को जोड़कर उसे अधिक शक्तिशाली बनाया .. इसमें किसी को किनारे करने वाली बात नहीं होनी चाहिए .. क्योकि आन्दोलन का जो स्वरुप आम व्यक्ति के ज्यादा करीब होगा वही व्यापक होगा उसकी ही स्वीकार्यता होगी ... जहा तक आपके लेख की बात है तो इसमें गालिया देने जैसी कोई बात नहीं है .. अन्ना व्यक्तिगत रूप से उसी जीभ की तरह है जो बत्तीस दांतों के बीच में है .. इस देश में बड़े परिवर्तन करने के लिए काम जमीनी स्तर पर होना ज्यादा जरुरी है .. ..जो सबसे बढ़िया बात आपने उठाई वो ये की इस मुद्दे को इस तरह से प्रचारित प्रसारित किया गया मानो लोकपाल बिल पास होते ही देश की सारी समस्याए समाप्त हो जाएँगी ... शांति भूषण परिवार अरबपति है ...और जिस तरह से आज इतनी बाते उठ रही है वे एकदम से बेबुनियाद नहीं हो सकती .. मेरा विचार यही है की आज रामदेव जी . श्री के. एन . गोविन्दाचार्य जी , और तमाम ऐसे लोग है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ एक लम्बे समय से लड़ रहे है बाते कर रहे है .. और इनकी व्यापक अपील भी है . अन्ना को इन्हें एक मंच पर लाने का प्रयास करना चाहिए था और एक व्यापक जनांदोलन का रूप देना चाहिये ..मगर जिस तरह से सब हुआ एक तरह की हड़बड़ी दिखी ..पुरे घटनाक्रम में.. यहाँ आपने व्यवस्थित तरीके से बात रखी है .. खैर भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई भी इमानदारी से लड़े हमें उसका साथ देना चाहिए ..

के द्वारा:

इस पराजित मनोवृत्ति का कारण – 1) “नेहरुवादी सेकुलरिज़्म” है? 2) या “मैकाले की गुलाम बनाने वाली शिक्षा” है? 3) या “गाँधीवादी अहिंसा” का नपुंसक बनाने वाला इंजेक्शन है? 4) या अंग्रेजों और मुगलों की गुलामी का असर अब तक नहीं गया है? 5) या कुछ और है? या सभी कारण एक साथ हैं? आपको क्या लगता है…? एक मजबूत, स्वाभिमानी, अपने कानूनों का निष्पक्षता से पालन करवाने वाले देश के रूप में क्या कभी हम “तनकर खड़े” हों पायेंगे या इतनी युवा आबादी के बावजूद ऐसे ही “घिसटते” रहेंगे…? आखिर इसका निदान कैसे हो…? ----------------------------------------------------------------------------------------------------------- क्षमा कीजियेगा, परन्तु जहाँ (जिस देश) के अधिकाँश लोगों की नसों में १. जातिवाद २. स्वार्थपरता ३. बाजारवाद ४. परिवारवाद ५. क्षेत्रवाद ६. गुलाम मानसिकता ७. दुस्चरित्र ८. दिखावा ९. विलासिता जैसे जहर खून की जगह दौड़ते हैं ... उन लोगों से आत्मसम्मान की उम्मीद रखना बेकार है ...... ---------------------------------------------------------------------------------------------------------- सरकारे नहीं बदल सकती क्योंकि वोट रूपयों में, शराब की थैलियों, भाई भतीजावाद, जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद से मिलता है ........ जो वोट किसे देना चाहिए समझते हैं सिर्फ चिल्लाने आदती हो गए हैं ... कुछ करना उनका भी काम नहीं है | ---------------------------------------------------------------------------------------------------------- और नेताओं की मनोवृत्ति ही गंदी वाली है, कि वो स्वयं उससे ऊपर उठ ही नहीं सकते .... इन सब को तलवे चाटने की लत लग गयी है | और जनता भी अपना कर्तव्य अपने अधिकार के लिए कुछ करने वाली नहीं है ... उसे भी दो रोटी खाकर पैर पसार कर सो लेने भर से काम है, जनता खुद नेताओं, पाखंडियों के हाथ में कठपुतली की तरह नाचती है | सारे चोर लुटेरे गुंडा नेता बनते हैं तब जनता कहाँ सोती रहती है | राजा ठाकरे , बाल ठाकरे, अरुंधती इत्यादि जैसे संपोलों की पूजा करते है | तो ऐसे जनता से भी कुछ आस रखना स्वयम को धोका देना है |

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

मिश्रा जी इन नेताओं को गली देने से क्या होगा? इन्हें नेता बनाया किसने? हम आप ही ने ना.... तो फिर दोषी तो हम आप ही हुए ना. जनता जनार्दन खुद ही यही चाहती है. ये देश अक्ल के अंधों का है. यहाँ की जनता मूर्ख है ( वाक्य कड़े हैं लेकिन कहना पड़ रहा है). अरबों खरबों के घोटाले हो गए, मंहगाई सुरसा की तरह मुह फाड़ रही है, फिर भी लगता है जनता जनार्दन को सांप सूंघ गया है. ये देश युवाओं का है लेकिन उनकी अक्ल पे पत्थर पड़ गए हैं. सारा दोष जनता का है. आजादी के ६३ साल हो गए हैं, एक पार्टी का अधिकतम शासन रहा है इस देश पे, उस पार्टी की कारगुजारी किसी से छुपी नही है, फिर भी उसी को वोट क्यों? सारा का सारा दोष जनता का है. (माफ़ कीजियेगा मुझे रोष के लिए)

के द्वारा:

के द्वारा: kmmishra kmmishra

सुरेश जी, मैं तो हतप्रभ हूँ स्वामी जी की बातों को और यहाँ प्रस्तुत दस्तावेजों को देखकर| क्या ये दस्तावेज़ कांग्रेसियों को नहीं दिखाई देते? सोनिया को को क्यों न एंटोनिया (मायनों?) कहा जाए? मायनों कहना भी क्या सही है जबकि उनका जन्म तब हुआ जब उनके पिता जेल में थे? यहाँ स्वामी जी की बात दीगर है कांग्रेसी एंटोनिया को शायद इसीलिए पूज रही हो क्योंकि उनका जन्म ईसा मसीह की ही तरह बिना पिता के हुआ है (लेडी क्राइस्ट कहें क्या?) दस्तावेजों और वीडियोज से समृद्ध इस पोस्ट को न पढ़ पाना बदकिस्मती ही कहूँगा शायद सभी ब्लोगर इसे संजो लेना चाहेंगे| मुझे इस ब्लॉग को कॉपी करने की अनुमति प्रदान करें! वन्देमातरम!

के द्वारा: chaatak chaatak

(“जातीय सफ़ाया”, यह शब्द सेकुलरों को बहुत प्रिय है, लेकिन सिर्फ़ मासूम मुस्लिमों के लिये, यह शब्द कश्मीर, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि में हिन्दुओं के लिये उपयोग करना वर्जित है)।वामपंथ और कट्टर इस्लाम हाथ में हाथ मिलाकर चल रहे हैं यह बात अब तेजी से उजागर होती जा रही है। वह तो भला हो कुछ वीर पुरुषों का, जो कभी संसद हमले के आरोपी जिलानी के मुँह पर थूकते हैं और कभी गिलानी पर जूता फ़ेंकते हैं, वरना अधिसंख्य हिन्दू तो कब के “गाँधीवादी नपुंसकता” के शिकार हो चुके हैं। . इन मौलाना साहब की हिम्मत नहीं है कि कश्मीर जाकर अब्दुल गनी लोन और यासीन मलिक से कह सकें कि पंडितों को ससम्मान वापस बुलाओ और उनका जो माल लूटा है उसे वापस करो, अलगाववादी राग अलापना बन्द करो)। . आनन्द पटवर्धन, एहतिशाम अंसारी, जावेद नकवी, सन्दीप पाण्डे (इनमें से कोई भी सज्जन गोधरा ट्रेन हादसे के बाद कारवां लेकर गुजरात नहीं गया) . सईदा हमीद, थॉमस मैथ्यू (जब ईसाई प्रोफ़ेसर का हाथ कट्टर मुस्लिमों द्वारा काटा गया, तब ये सज्जन कारवां लेकर केरल नहीं गये) . शबनम हाशमी, शाहिद सिद्दीकी (धर्मान्तरण के विरुद्ध जंगलों में काम कर रहे वयोवृद्ध स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या होने पर भी ये साहब लोग कारवाँ लेकर उड़ीसा नहीं गये)… कश्मीर तो खैर इनमें से कोई भी जाने वाला नहीं है… लेकिन ये सभी फ़िलीस्तीन जरुर जायेंगे। धर्मनिरपेक्षता के पाखंडियों को अच्छा धोया आपने । धर्मनिरपेक्षता का एक ही अर्थ है हिंदू धर्म पर थूकना और ................ के थूके हुये को चाटना ।

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आ गया भाई फैसला आगया. अब जो मस्जिद तोड़ कर मूर्ति वहां राखी गयी थी वहां मंदिर बनाया जा सकता है. अब खुश रहो अगर सिर्फ उसी मंदिर में तुम्हें राम मिलें तो. फैसले से बहुत तरह की बातें पैदा हो गयीं जैसा की पहले ही अनुमान किया गया था. फिर दूसरा पक्ष सुप्रीम कोर्ट जायेगा. फिर यह मामला वर्षों चलेगा. लोगों ने न्यायलय के कथित न्याय को नहीं स्वीकारा. सवाल यह रहा के न्यायलय ने सबूतों के सहारे से यह फैसला सुनाया या आस्था पर आधारित हो कर इसे मान लिया. क्या न्याय ब्यवस्था अब आस्था को अपना कर ही अपने सारे फैसले सुनाएगी. इसके साथ ही न्यायलय का निष्पक्ष न्याय करने को ढोंग उजागर हो जाता है. पेश किया गया कोई भी सबूत नहीं साबित कर सका की वहां मंदिर ही था. खुदाई में कुछ गैर मुस्लिम धर्म से सम्बंधित ( ज़रूरी नहीं के हिन्दू धर्म से ही ) कुछ चीज़ें मिली थीं. लेकिन उन जांच एजेंसियों में एक भी मुस्लिम को नहीं रखा गया विटनेस के तौर पर भी. इससे जांच तो शक के अन्दर पर है ही. रही हिन्दुओं के आस्था की बात. हिन्दू भाई लोग तो ऐसे बोल रहे है जैसे की उसी मस्जिद के अन्दर ही उनके राम पैदा हुए हैं. और कुछ तो ज़मीन पर ऊँगली से छूकर दिखने की कोशिश करते हैं की राम यहीं इसी जगह पर पैदा हुए थे. जैसे की जनाब उनके पैदा होने के वक़्त वहीँ पर खड़े देख रहे थे. इसका कोई सबूत ही नहीं है. हाँ मस्जिद के बहार कुछ वर्षों तक एक चबूतरे पर लोग पूजा किया करते थे लेकिन तब राम बहार पैदा हुए थे और अब अहिस्ता अहिस्ता अन्दर कैसे चले गए. समझ से परे है. फैसला तो हो गया. लेकिन क्या सही हुआ. ऐसा लगता तो नहीं है. एक तरफ मस्जिद जिसके होने के और girane के har तरफ के सबूत maujood हैं और dusri तरफ मंदिर जिसके होने के कोई सबूत नहीं, फिर भी फैसला सबूतों के aadhaar पर मंदिर के पक्ष में कैसे de diya गया? यह न्याय bywastha पर badnuma daag है. hona तो यह chahiye था की वहां फिर से baaizzat मस्जिद banane का hukm diya जाता. फिर मुस्लिम is बात का khyaal कर के के यह हिन्दुओं के आस्था से juda है तो यह जगह chhor den unhen ही mandir banane den. is से sabhi खुश rahte. और woh chhor भी sakte थे. लेकिन अब जो हुआ है sada के liye us जगह पर khatra हो गया है. वहां कुछ भी हो सकता है अगर donon रहे तो. यह beej तो boya जा chuka है.

के द्वारा:

सुरेश जी, लेख में अवतरित सभी उदाहरण चीख चीख कर कह रहे हैं की जब भी इस देश को नरमुंडों की जरूरत हुई तब तब हिन्दुओं ने अपनी गर्दने कटवाई लेकिन जब बार नीतियों की आई तो न इस धर्म के लिए कोई नीति थी न इनके सम्मान के लिए | इस समुदाय की याद आज भी सरकार को तब आती है जब इसकी आस्था पर प्रहार करना हो या जब इसे पुचकार कर इसके जायज़ हक़ से वंचित करना हो| फैसला कुछ भी आये लेकिन इस बार निश्चय ही हिन्दू ठगा नहीं जाएगा और यदि कोशिश हुई तो दुनिया इस बार हिन्दुस्तान में भीड़तंत्र के स्थान पर एक बिलकुल नयी राजनैतिक और सामजिक व्यवस्था की स्थापना की गवाह बनेगी| तथ्यपरक-सामयिक राष्ट्रवादी लेखन पर कोटिशः बधाइयाँ! वन्दे-मातरम!

के द्वारा: chaatak chaatak

आँखें खोलने,मनोमस्तिष्क को झकझोरने वाला लेख.लेकिन दुर्भाग्य,हम संवेदनशील हो चुके हैं .कोई अंतर नहीं पड़ता की किसी हिन्दू महापुरुष का अपमान होता है या देब्वी देवताओं का,यहाँ तक की भारत माता का,जो किसी धर्म के दायरे में नहीं आतीं.ऐसा लगता की अगर ये सब देख सुनकर कष्ट होता भी तो इसलिए मौन साध लिया जाता है की कभी हमारे ऊपर हिन्दू संघटन से जुड़े होने का आरोप न लग जाये.न जाने हम भारतियों में ये साहस कब आएगा की हम पक्षपात रहित हो सही गलत को सही रूप से कह सकेंगे. नेता या राजनीतिक दल तो बेचारे वोटों की गरज से मुख नहीं खोल सकते पर जनता को किसका भय?वैसे सत्ता हाथ में लेने के लिए प्रतेयक दल केवल वोटों का गणित देखता है.

के द्वारा:

जलाल भाई, लतखोर शब्द का अर्थ होता है "सतत लात खाने वाला", आप मुझे बतायें पाकिस्तान, चीन, अहसानफ़रामोश बांग्लादेश जैसे देश आये दिन भारत को लतियाते नहीं हैं क्या? हम करते क्या हैं उनके खिलाफ़ सिवाय हें हें हें हें हें हें करके फ़ूहड़ खिसियाने बयान देने के अलावा? कैसी पिलपिली महाशक्ति हैं हम? इतने बड़े हथियारों के जखीरे का क्या फ़ायदा, जब श्रीलंका और नेपाल जैसे पिद्दी देश हमें आये दिन धमकाते रहें और हमसे धन भी वसूलते रहें? लतखोर शब्द "गाँधीवादियों" के लिये खासतौर से उपयोग किया गया है जिनकी अहिंसा की नीति नपुंसकता की नीति बनकर रह गई है। 1971 में हमने आखिरी युद्ध लड़ा था (करगिल युद्ध नहीं था, सिर्फ़ घुसपैठियों को खदेड़ा गया था)। 40 साल से हमने एक भी युद्ध नहीं लड़ा है, काहे की महाशक्ति? यदि आर्थिक महाशक्ति मानते हो तो बच्चा भी बता सकता है कि हम अमेरिका और MNC के गुलाम हैं और उनके फ़ायदे की नीतियां बनाते हैं… हुए कि नहीं लतखोर? भारत तो महान है, इसकी जनता भी महान है, लेकिन भ्रष्ट नेताओं और हरामखोर अफ़सरों ने मिलकर इसे "लतखोर" बना दिया है, कोई भी जब चाहे आता है और लात मारकर चलता बनता है… चाहे बड़ा कातिल एण्डरसन हो या पुरुलिया में विमान से हथियार गिराने वाला रूसी पायलट…हम सबके सामने सिर्फ़ दुम हिलाने के लिये ही बने हैं…

के द्वारा: sureshchiplunkar sureshchiplunkar

आपका लेख पढ़ा. हिन्दुस्तान पकिस्तान के बीच चल रहे वर्षों से बहुत तरह के और बहुत तरह से विवाद रहे. जिसमें हिन्दुस्तान ने जहाँ तक हो सका अपनी इंसानियत का परिचय दिया. और आगे भी हिन्दुस्तान अपनी पहचान नहीं छोड़ेगा. हम सभी इन विवादों को अच्छी तरह से जानते हैं. लेकिन मुझे आपके लतखोर शब्द पर सख्त ऐतराज़ है जो आपने हिन्दुस्तान के लिए इस्तेमाल किया है. आपने गांधीवादी और देश को लतखोर कह कर सभी हिन्दुस्तानियों का अपमान किया है. आपके मुंह को इन्होने ही आजादी दी है. और अब इन्हें ही गाली देने लगे हैं. गाँधी और उनके जैसे लोग वोह शख्सियत हैं जिन्होंने जान पर खेल कर आज़ादी दिलाया. जिसके वजह से आज आप बोल पा रहे हैं. आपने जिस थाली में खाया उसी में छेद किया जैसा ही काम किया है. और जिस तरह आपने देश को लतखोर कहा है तो आप भी उसमें आप भी लतखोर हैं. आप देश के साथ गलत शब्दों का प्रयोग कर देश को गाली न दें. और आप लतखोर शब्द अपने हर जगह से हटा लें जहाँ भी यह हिन्दुस्तान से जुड़ा हो. जय हिंद.

के द्वारा: jalal jalal

क्या हिंदुत्व के ठेकेदार कुछ खास लोग ही है या केवल कथित भाव ब्रिगेड ही केवल हिंदुत्व की रक्षक है अच्छा हो आप इसी ब्लोग्स में श्री पियूष पन्त का लेख हिंदुत्व के रखवाले… का अध्यन अवश्य करें नरेन्द्र मोदी या और भी कोई व्यक्ति दूध का धुला नहीं हो सकता न ही कभी कोई कह सकता है की शुह्राबुद्दीन अपराधी नहीं था ......अगर आप का विश्वाश भारतीय सविंधान में नहीं है तो आप कुछ भी कह समझ सकते है अन्यथा आप अगर संविधान को मानाने वाले है तो संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार प्राप्त व्यक्ति समूह अथवा संस्था का क्या दोष है अगर हिम्मत तो संविधान को लक्ष्य करके लिखें रही बात नरेन्द्र मोदी की तो कृपया आप यु ट्यूब पर नरेन्द्र मोदी का फॅमिली प्रोफाइल देख ले आप को मालूम हो जायगा की जो व्यक्ति अपने भौतिक सुख के आगे अपने सामाजिक बंधन के दायित्व को नहीं निबाह सकता वह कितना महान है रही बात हिंदुत्व की तो हिंदुत्व किसी की निजी जागीर नहीं है और हिंदुत्व किसी को हिंसा करने के लिए नहीं कहता है अगर ऐसा न होता तो आज बोद्ध, जैन, सिख, न होते और न ही इनका प्रसार पुरे विश्व में होता / रही बात सी बी आई के दुर्पयोग की तो क्या एन डी ए के शासन काल में तहलका वाले पत्रकार का सी बी आई ने क्या हाल किया था वह क्या था सी बी आई कोई स्वतंत्र संस्था तो है नहीं चाहे वह कितनी ही निष्पक्ष हो विरोधी पक्ष कभी संतुष्ट नहीं हो सकता.

के द्वारा:

सुरेश जी नमश्कार ..लेख काफी लम्बा था पर विषय और विचार इतने महत्वपूर्ण थे की २ बार लेख को पढ़ा मैंने ..बहुत महत्वपूर्ण और ज्वलंत मुद्दा है....और आपके प्रश्न बहुत प्रासंगिक है ... राष्ट्रवादी मीडिया मर चूका है ....आज जिसे हम देखते है वह बाजार के इशारो पर नाचने वाला शोर मचाने वाला एक तंत्र है जिसे इसकी परवाह नहीं की एक राष्ट्र की संप्रभुता खतरे में पड़े ..,, ये कांग्रेस ने देश को अपनी जागीर समझ लिया है ..और अन्य पार्टियों के साथ विपक्ष भी नाकारा हो चूका है ये कहने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है ...आखिर देश की दलाली में सभी को कुछ मिलेगा ही ...और हो सकता है की मिल भी रहा हो..वरना ६३ सालो में हम कश्मीर में खरबों रुपये लगाकर भी भीख नहीं मांग रहे होते .....आपने सही कहा उन राष्ट्रद्रोहियो में जो गुस्सा है वह उसी हरामखोरी की चर्बी से उपजा है ..जो मुफ्त में बात दी गई.... हम एक नाकारा सरकार द्वारा शाशित है जो आतंरिक मोर्चे पर भी हाथ बंधे खड़ी है और बहरी मोर्चो पर भी , कश्मीर मुद्दे पर आरपार के निर्णय लिए जाने की जरुरत है इसके लिए हमें निरंकुश होना पड़े तो भी आगे बढ़कर राष्ट्रद्रोहियो की जबाने खीच कर तालिबानी सजाये देनी चाहिए..... अन्यथा हम इस नासूर से कभी उबार नहीं पाएंगे...... समाधान की जगह टालने की प्रवृत्ति कबतक चलेगी?

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

आपका हर लेख आईने की तरह सच्चाई दिखाते हुए कल्पनालोक की फ़ंतासी से खींचकर बाहर निकालने का पुरज़ोर प्रयास करता आया है । परन्तु हम ऐसे मानने वाले हैं कहाँ? आदत हो चुकी है कि आग जब तक हमारे बेडरूम के पलंग को न जलाना शुरू कर दे, बाढ़ अपने छप्पर को न लीलने लगे, ट्रेन और बस में डकैत का हाथ जब तक अपनी बीवी के दामन तक न पहुँच जाय, तब तक हमारा पुंषत्व (यदि कोई है तो) समाधिस्थ ही रहता है । कभी-कभी ग्लानिवश ऐसा लगता है कि कुछ लोगों का यह विचार, कि उस समय अभी हमारी मानसिकता आज़ादी पाने के क़ाबिल नहीं थी, समय से कुछ पूर्व ही पेड़ फ़लित हो गया, शायद ठीक ही है । आँखें खोलने का प्रयास करने के लिये साधुवाद । … शाही ।

के द्वारा:

वैसे तो राहुल महाजन जैसे शख्‍स पर कलम का ज्ञान बर्बाद करने का कोई औचित्‍य नहीं है लेकिन आपने इस आर्टिकल में जिस तरह से न्‍यूज चैनल वालों की मनोदशा का जिक्र किया है वह वाकई सराहनीय है। आजकल लोग इतने जागरुक हो चुके हैं कि हर व्‍यक्ति देश में होने वाली घटना की पल-पल की खबर के लिए न्‍यूज चैनल देखता रहता है, ऐसे में कुछ न्‍यूज चैनल जबरन इस चीज को दर्शकों पर थोप रहे हैं। में दर्शकों को इसमें कसूरवार नहीं समझता क्‍योंकि जब हर न्‍यूज चैनल इस अंधी दौड में शामिल हो गया तो बेचारा समाचार देखने-सुनने का इच्‍छुक दर्शक कहां जाएगा, मजबूरन वह इसे देखने के लिए ही मजबूर होगा। उम्‍मीद है कि न्‍यूज चैनल निकट भविष्‍य में ऐसे आदमी को सेलीब्रिटी के तौर पर पेश करने जैसी हरकत से गुरेज करेंगे जिसकी हरकतों को परिवार में बैठकर देखा तक नहीं जा सकता।

के द्वारा: Manish Sharma Manish Sharma

के द्वारा:

सुरेश जी, आपकी पोस्ट पढ़कर बड़ा अच्छा लगा कि आप अपने शहर का विरासती नाम सहेजे रखना चाहते हैं लेकिन जिस तरह का कमजोर आन्दोलन आप लोग कर रहे हैं लगता नहीं कि आप शहर का नाम बचा पायेंगे| आपके दर्द का अंदाजा मैं भली भांति लगा सकता हूँ क्योंकि मैं स्वयं एक ऐसे जिले से ताल्लुक रखता हूँ जहाँ के नाम पर राज्य सरकार की गन्दी निगाह पड़ चुकी है और चाटुकारों के प्रभाव में आकर मुख्य-मंत्री ने बाकायदा नाम करण करके लिखित फरमान भी जारी कर दिया था लेकिन अपने सांसद की अगुआई में जनपद वासियों की प्रतिबधता ने सरकार को बैक-फुट पर जाने को मजबूर कर दिया| हमारे शहर का नाम आज भी "गोंडा" है| उसका कारण है कि हम अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए सड़क पर उतरने में देर नहीं लगाते| प्रदर्शन शांतिपूर्ण पैदल यात्रा के रूप में था लेकिन प्रतिबद्धता सैनिकों वाली थी| अगर आप सच में अपने शहर के नाम से उसकी धरोहर से प्यार करते है तो घर से बाहर निकलिए और मुखर होकर अपनी बात कहिये इन बहरे मूढ़ लोगों को वैसे सुनाई नहीं पड़ेगा| आपके आन्दोलन के लिए शुभ-कामनाएं|

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: sureshchiplunkar sureshchiplunkar




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