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राहुल महाजन ज्यादा छिछोरा है या हिन्दी न्यूज़ चैनल…?

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विगत दो दिनों से जिसने भी भारतीय टीवी चैनलों (हिन्दी) को देखा होगा, उसने लगभग प्रत्येक चैनल पर स्वर्गीय प्रमोद महाजन के “सपूत”(?) राहुल महाजन और उसके द्वारा पीटी गई उसकी “बेचारी”(?) पत्नी डिम्पी गांगुली की तस्वीरें, खबरें, वीडियो इत्यादि लगातार देखे होंगे। राहुल महाजन ने ऐसा किया, राहुल महाजन ने वैसा किया, उसने अपनी बीवी को कब-कहाँ-कितना और कैसे पीटा? डिम्पी की जाँघों और पिंडलियों पर निशान कैसे थे? राहुल महाजन ऐसे हैं, राहुल महाजन वैसे हैं… आदि-आदि-आदि, ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला…

हालांकि वैसे तो पहले से ही भारतीय हिन्दी न्यूज़ चैनलों की मानसिक कंगाली जगज़ाहिर है, लेकिन जिस तरह से सारे चैनल “गिरावट” की नई-नई इबारतें लिख रहे हैं, वैसा कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा। भारत में लोकतन्त्र है, एक स्वतन्त्र प्रेस है, प्रेस परिषद है, काफ़ी बड़ी जनसंख्या साक्षर भी है… इसके अलावा भारत में समस्याओं का अम्बार लगा हुआ है फ़िर चाहे वह महंगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद, खेती की बुरी स्थिति, बेरोजगारी जैसी सैकड़ों बड़े-बड़े मुद्दे हैं, फ़िर आखिर न्यूज़ चैनलों को इस छिछोरेपन पर उतरने क्या जरूरत आन पड़ती है? इसके जवाब में “मीडियाई भाण्ड” कहते हैं कि 24 घण्टे चैनल चलाने के लिये कोई न कोई चटपटी खबर चलाना आवश्यक भी है और ढाँचागत खर्च तथा विज्ञापन लेने के लिये लगातार “कुछ हट के” दिखाना जरूरी है।

चैनलों के लिये राहुल महाजन “इज्जत” से पुकारे जाने योग्य ऐसे-वैसे हैं, लेकिन मेरी ऐसी कोई मजबूरी नहीं है, क्योंकि वह आदमी इज्जत देने के लायक है ही नहीं। सवाल उठता है कि राहुल महाजन आखिर है क्या चीज़? क्या राहुल महाजन बड़ा खिलाड़ी हैं? क्या वह बड़ा अभिनेता है? क्या वह उद्योगपति है? क्या उसने देश के प्रति कोई महती योगदान दिया है? फ़िर उस नशेलची, स्मैकची, बिगड़ैल, पत्नियों को पीटने का शौक रखने वाले, उजड्ड रईस औलाद में ऐसा क्या है कि जीटीवी, आज तक, NDTV जैसे बड़े चैनल उसका छिछोरापन दिखाने के लिये मरे जाते हैं? (इंडिया टीवी को मैं न्यूज़ चैनल मानता ही नहीं, इसलिये लिस्ट में इस महाछिछोरे चैनल का नाम नहीं है)।

जिस समय प्रमोद महाजन की मौत हुई थी, तब शुरुआत में ऐसा लगा था कि राहुल महाजन की दारुबाजियों और अवैध हरकतों को मीडिया इसलिये कवरेज दे रहा है कि इससे प्रमोद महाजन की छवि को तार-तार किया जा सके, लेकिन धीरे-धीरे राहुल महाजन तो “पेज-थ्री” सेलेब्रिटी(?) बन गया। पहले बिग बॉस में उसे लिया गया और उस प्रतियोगी शो में भी राहुल महाजन पर ही कैमरा फ़ोकस किया गया, कि कैसे उसने स्वीमिंग पूल में फ़लाँ लड़की को छेड़ा, कैसे राहुल ने पायल रोहतगी (एक और “सी” ग्रेड की अभिनेत्री) के साथ प्यार की पींगें बढ़ाईं, इत्यादि-इत्यादि। माना कि “बिग बॉस” अपने-आप में ही एक छिछोरेपन वाला रियलिटी शो कार्यक्रम था, लेकिन और भी तो कई प्रतियोगी थे… अकेले राहुल महाजन को ऐसा कवरेज देना “फ़िक्सिंग” की आशंका पैदा करता है।

खैर जैसे-तैसे बिग बॉस खत्म हुआ, और फ़िर भी राहुल महाजन का भूत चैनलों के सर से नहीं उतरा। एक और टीवी चैनल इस “रंगीले रसिया” को स्वयंवर के लिये ले आया, इस चैनल ने एक बार भी नहीं सोचा कि अपनी बचपन की सहेली के साथ मारपीट करके घर से निकालने वाले इस “वीर-पुरुष” के सामने वह कई लड़कियों की “परेड” करवा रहे हैं। जहाँ एक तरफ़ बिग बॉस “छिछोरा” कार्यक्रम था, तो “राहुल दुल्हनिया ले जायेंगे” पूरी तरह से फ़ूहड़ था, जिसका विरोध नारी संगठनों ने आधे-अधूरे मन से किया, लेकिन मीडिया के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। (शायद “राहुल” नाम में ही कुछ खास बात है, कि “मीडियाई भाण्ड” इसके आगे बगैर सोचे-समझे नतमस्तक हो जाते हैं… आपको राहुल भट्ट याद ही होगा जो डेविड कोलमैन से रिश्तों के बावजूद आसानी से खुला घूम रहा है, जबकि प्रज्ञा ठाकुर रासुका में बन्द है…)

और अब जबकि एक और “राहुल” ने अपनी दूसरी बीबी को बुरी तरह पीटा है तो फ़िर से चैनल अपना-अपना कैमरा लेकर दौड़ पड़े हैं, उसकी बीबी की मार खाई हुई टांगें दिखा रहे हैं, फ़िर दोनों को मुस्कराते हुए साथ खाना खाते भी दिखा रहे हैं… ये कैसा “राष्ट्रीय मीडिया” है? दिल्ली और मुम्बई के बाहर क्या कोई महत्वपूर्ण खबरें ही नहीं हैं? लेकिन जब “पेज-थ्रीनुमा” फ़ोकटिया हरकतों की आदत पड़ जाती है तो चैनल दूरदराज की खबरों के लिये मेहनत क्यों करें, राखी सावन्त पर ही एक कार्यक्रम बना लें, या अमिताभ के साथ मन्दिर का चक्कर लगायें, या धोनी की शादी (जहाँ धोनी ने उन्हें अपने दरवाजे से बाहर खड़ा रखा था) की खबरें ही चलाएं। (एक चैनल तो इतना गिर गया था कि उसने धोनी की शादी और हनीमून हो चुकने के बाद, उस होटल का कमरा दिखाया था कि “धोनी यहाँ रुके थे, धोनी यहाँ सोए थे, धोनी इस कमरे में खाये थे… आदि-आदि), क्या हमारा तथाकथित मीडिया इतना मानसिक कंगाल हो चुका है? क्या लोग न्यूज़ चैनल इसलिये देखते हैं कि उन्हें देश के बारे में खबरों की बजाए किसी फ़ालतू से सेलेब्रिटी के बारे में देखने को मिले? इस काम के लिये तो दूसरे कई चैनल हैं।

चलो कुछ देर के लिये यह मान भी लें कि न्यूज़ चैनलों को कभीकभार ऐसे प्रोग्राम भी दिखाने पड़ते हैं, ठीक है… लेकिन कितनी देर? राहुल महाजन को “कितनी देर का कवरेज” मिलना चाहिये, क्या यह तय करने लायक दिमाग भी चैनल के कर्ताधर्ताओं में नहीं बचा है? राहुल महाजन जैसे “अनुत्पादक” व्यक्ति, जो न तो खिलाड़ी है, न अभिनेता, न उद्योगपति, न ही राजनेता… ऐसे व्यक्ति को चैनलों पर इतना समय? क्या देश में और कोई समस्या ही नहीं बची है? तरस आता है इन चैनल मालिकों की बुद्धि पर और उनके सामाजिक सरोकारों पर… क्योंकि एक और “राहुल” (गाँधी) द्वारा दिल्ली की सड़कों पर साइकल चलाना भी इनके लिये राष्ट्रीय खबर होती है।

भारत जैसे देश में “सेलेब्रिटी”(?) होना ही पर्याप्त है, एक बार आप सेलेब्रिटी बन गये तो फ़िर आप में अपने-आप ही कई गुण समाहित हो जायेंगे। सेलेब्रिटी बनने के लिये यह जरूरी नहीं है कि आप किसी क्षेत्र में माहिर ही हों, अथवा आप कोई बड़ा सामाजिक कार्य ही करें… सेलेब्रिटी बनने की एकमात्र क्वालिफ़िकेशन है “किसी बड़ी राजनैतिक हस्ती” से निकटता या सम्बन्ध होना… बस इसके बाद आपके चारों तरफ़ मीडिया होगा, चमचेनुमा सरकारी अधिकारी होंगे, NGO बनाकर फ़र्जी चन्दा लेने वालों की भीड़ होगी, किसी समिति-वमिति के सदस्य बनकर विदेश घूमने का मौका मिलेगा… यानी की बहुत कुछ मिलेगा।

उदाहरण के लिए मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा महिला प्रौढ़ शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिये जो ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाये जाने वाले हैं, उनकी सूची ही देख लीजिये कि अधिकारियों ने किस मानसिकता के तहत उक्त नाम भेजे हैं – नीता अम्बानी, प्रियंका वढेरा (सॉरी, गाँधी), कनिमोझी और सुप्रिया सुले । अब आप अपना सिर धुनते रहिये, कि आखिर इन चारों महिलाओं ने सामाजिक क्षेत्र में ऐसे कौन से झण्डे गाड़ दिये कि इन्हें महिला प्रौढ़ शिक्षा का “ब्राण्ड एम्बेसेडर” बनाया जाये? इनमें से एक भी महिला ऐसी नहीं है जो “ज़मीनी हकीकत” से जुड़ी हुई हो, अथवा जिसकी अपनी “खुद की” बनाई हुई कोई पहचान हो। नीता अम्बानी जो भी हैं सिर्फ़ मुकेश अम्बानी और रिलायंस की वजह से, प्रियंका गाँधी के बारे में तो सभी जानते हैं कि यदि नाम में “वढेरा” लगाया जाये तो कोई पहचाने भी नहीं… सुप्रिया सुले की एकमात्र योग्यता(?) शरद पवार की बेटी होना और इसी तरह कनिमोझि की योग्यता करुणानिधि की बेटी होना है, अब इन्हें प्रौढ़ शिक्षा का ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाने की सिफ़ारिश करना मंत्रालय के अधिकारियों की चमचागिरी का घटिया नमूना नहीं तो और क्या है? क्या इस सामाजिक काम के लिये देश में “असली सेलेब्रिटी” (जी हाँ असली सेलेब्रिटी) महिलाओं की कमी थी? साइना नेहवाल, मेरीकॉम, किरण बेदी, चंदा कोचर, शबाना आज़मी, मेधा पाटकर जैसी कई प्रसिद्ध लेकिन ज़मीन से जुड़ी हुई महिलाएं हैं, यहाँ तक कि मायावती और ममता बनर्जी की व्यक्तिगत उपलब्धियाँ और संघर्ष भी उन चारों महिलाओं से कहीं-कहीं अधिक बढ़कर है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, “मीडिया और चाटुकार” मिलकर पहले सेलेब्रिटी गढ़ते हैं, फ़िर उनके किस्से-कहानी गढ़ते हैं, फ़िर दिन-रात उनके स्तुतिगान गाकर जबरदस्ती जनता के माथे पर थोपते हैं।

हालांकि सच्चे अर्थों में संघर्ष करने वाले ज़मीनी लोग कैमरों की चकाचौंध से दूर समाजसेवा के क्षेत्र में अपना काम करते रहते हैं फ़िर भी मीडिया का यह कर्तव्य है कि वह ऐसे लोगों को जनता के सामने लाये… और उन पर भी अपना “बहुमूल्य”(?) समय खर्च करे…। हमारे मालवा में पूरी तरह से निकम्मे (Useless) व्यक्ति को “बिल्ली का गू” कहते हैं, यानी जो न लीपने के काम आये, न ही कण्डे बनाने के… जब भी, जहाँ भी गिरे गन्दगी ही फ़ैलाए…। टीवी पर बार-बार राहुल महाजन के कई एपीसोड देखने के बाद एक बुजुर्ग की टिप्पणी थी, “यो प्रमोद बाबू को छोरो तो बिल्ली को गू हे, अन ई चेनल वाला भी…”

ताज़ा खबर दिखाई गई है कि “राहुल महाजन ने अपनी पिटाई की हुई बीबी के साथ सिद्धिविनायक के दर्शन किये…” यानी कि तीन दिन बाद भी राहुल महाजन मीडिया की हेडलाइन था, सो अब यह तय करना मुश्किल होता जा रहा है कि राहुल अधिक छिछोरा है या हमारा “सो कॉल्ड नेशनल मीडिया”…

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ujjwal के द्वारा
October 31, 2011

ोोजला ेोपग तगकपो पोग ेगी….साीा कपोबोत ेा ूद पोसोीग सा्गबो पग वाकोी पोग…ोही ाक वोोू घळअघओ ऊऩ ूद लाैे मपोलातत पोग पग लपग ेोवेा वाकोी ोही ुपोूगबो लाैे मपोलाात…

prabhatrathore के द्वारा
August 14, 2010

suresh ji apka josh kabile tarif hai par toda sa aur hosh ki jaroorarat hai,kyoki hum hamesha system ko dosh dete hai,par meri ek baat yaad rakna duniya ka koi bhi system bina jagrook public ke theek nahi ho sakta hai .isliye bhai pahle ham sabhi ko apne bhai logo mein jagran lane ki koshish karni chaiye saath hi system ko. Thanks for ur Josh

Manish Sharma के द्वारा
August 7, 2010

वैसे तो राहुल महाजन जैसे शख्‍स पर कलम का ज्ञान बर्बाद करने का कोई औचित्‍य नहीं है लेकिन आपने इस आर्टिकल में जिस तरह से न्‍यूज चैनल वालों की मनोदशा का जिक्र किया है वह वाकई सराहनीय है। आजकल लोग इतने जागरुक हो चुके हैं कि हर व्‍यक्ति देश में होने वाली घटना की पल-पल की खबर के लिए न्‍यूज चैनल देखता रहता है, ऐसे में कुछ न्‍यूज चैनल जबरन इस चीज को दर्शकों पर थोप रहे हैं। में दर्शकों को इसमें कसूरवार नहीं समझता क्‍योंकि जब हर न्‍यूज चैनल इस अंधी दौड में शामिल हो गया तो बेचारा समाचार देखने-सुनने का इच्‍छुक दर्शक कहां जाएगा, मजबूरन वह इसे देखने के लिए ही मजबूर होगा। उम्‍मीद है कि न्‍यूज चैनल निकट भविष्‍य में ऐसे आदमी को सेलीब्रिटी के तौर पर पेश करने जैसी हरकत से गुरेज करेंगे जिसकी हरकतों को परिवार में बैठकर देखा तक नहीं जा सकता।

sanchita ghosh के द्वारा
August 5, 2010

sawal ye nahi hai ki kon jyada chichora hai ?sawal ye ye ki hum kya dekhna pasand karte hai ?mera manna hai ki jabtak humlog dusron ki life mai masala dundhte rahenge tabtak midea vale bhi humko isitarah ki khabren parosti rahegi .

kiran के द्वारा
August 4, 2010

24 ghate ke khabaria channels ne kuch aise logo ko janta par thop diya hai jo kisi kam ke nahi hai. janta ko bevajah hi aise logo ko bugatna padta hai.mujhe bhi india tv channel news channel lagta hi nahi . use toh apna naam koi bhutia serial ke naam par rakh lena chahiye

RAJ.A के द्वारा
August 4, 2010

आपने सही लिखा है. ये ब्लॉग पढ़कर ऐसा लगा की देश को आप जैसे लोगों की जरुरत है. कृपया इशी तरह लिखते रहे. धन्यवाद्.

aakashtiwaary के द्वारा
August 3, 2010

सुरेश जी आपने क्या खूब लिखा है धन्यवाद. काश न्यूज़ वाले आपका ब्लॉग पढ़ लेते. Aakash

Soni garg के द्वारा
August 3, 2010

छिछोरे, मिडिया वाले नहीं वो दर्शक है जो इन्हें टीआरपी देते है और जब तक इन्हें ऐसे दर्शक मिलते रहेंगे इनकी छिछोरी न्यूज़ ऐसे ही चलती रहेंगी ! आज इसी का नतीजा है की सही मायनो में टीवी पर वास्तव में दिखाए जाने वाले लोगो के लिए जगह ही नहीं है ! आपने जिन महिलाओं के नाम सुझाये उनमे दो नाम और जोड़ना चाहूंगी पहला झूलन गोस्वामी जो की आईसीसी की महिला वन डे रेनकिंग में टॉप बोलर है और दूसरी मिताली राज जो आईसीसी की ही महिला वन डे रेनकिंग में टॉप बेत्स्वुमैन है ! लेकिन इन दोनों के ही नाम अभी तक तो मैंने किसी भी न्यूज़ चेनल पर नहीं देखे !

Rajeev K Sharma के द्वारा
August 3, 2010

यह दिखाता है की भारतीय संस्कृति के रखवाले होने का ढोंग करने वालो के घरो का क्या हाल है, अरे जो लोग अपना घर नहीं संभाल पाए वह देश क्या संभाले गे !!

samta gupta kota के द्वारा
August 3, 2010

सुरेश जी,इसमें बेशक मीडिया ने बाज़ी मार ली,

K M Mishra के द्वारा
August 3, 2010

राहुल और न्यूज चैनेल दोनो ही एक ही थैले के चट्टे बट्टे हैं ।

Gopal Raju के द्वारा
August 2, 2010

समझ नहीं आता कि राहुल को इतनी importance क्यों दी जा रही है. आखिर वो है क्या ?????? गोपाल राजू ब्लोगर

    Rabindra Singh के द्वारा
    August 4, 2010

    आपने सही लिखा है yaha to sab ke sab waise hi hai


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