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नौकरशाही या मानसिकता? विश्वनाथन आनन्द के अपमान के पीछे कौन…

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विश्व के नम्बर एक शतरंज खिलाड़ी और भारत की शान समझे जाने वाले विश्वनाथन आनन्द क्या भारत के नागरिक नहीं हैं? बेशक हैं और हमें उन पर नाज़ भी है, लेकिन भारत की नौकरशाही और बाबूगिरी ऐसा नहीं मानती। इस IAS नौकरशाही और बाबूराज की आँखों पर भ्रष्टाचार और चाटुकारिता वाली मानसिकता की कुछ ऐसी चर्बी चढ़ी हुई है, कि उन्हें सामान्य ज्ञान, शिष्टाचार और देशप्रेम का बोध तो है ही नहीं, लेकिन उससे भी परे नेताओं के चरण चूमने की प्रतिस्पर्धा के चलते इन लोगों खाल गैण्डे से भी मोटी हो चुकी है।

विश्वनाथन आनन्द को एक अन्तर्राष्ट्रीय गणितज्ञ सम्मेलन में हैदराबाद विश्वविद्यालय द्वारा मानद उपाधि का सम्मान दिया जाना था, जिसके लिये उन्होंने अपने व्यस्त समय को दरकिनार करते हुए अपनी सहमति दी थी। लेकिन भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने विश्वनाथन आनन्द की “भारतीय नागरिकता” पर ही सवाल खड़े कर दिये, मंत्रालय के अधिकारियों का कहना था कि भले ही आनन्द के पास भारतीय पासपोर्ट हो, लेकिन वह अधिकतर समय स्पेन में ही रहते हैं। विश्वनाथन आनन्द की नागरिकता के सवालों(?) से उलझी हुई फ़ाइल जुलाई के पहले सप्ताह से 20 अगस्त तक विभिन्न मंत्रालयों और अधिकारियों के धक्के खाती रही। हैदराबाद विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट प्रदान करने के बारे में सारे पत्र-व्यवहार 2-2 बार फ़ैक्स किये, लेकिन नौकरशाही की कान पर जूं भी नहीं रेंगी। इन घनचक्करों के चक्कर में विश्वविद्यालय को यह सम्मान देरी से देने का निर्णय करना पड़ा, हालांकि पहले तय कार्यक्रम के अनुसार आनन्द को विश्व के श्रेष्ठ गणितज्ञों के साथ शतरंज भी खेलना था और उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि भी दी जाना थी। विवि के अधिकारियों और आनन्द, दोनों के सामने ही यह अपमानजनक स्थिति उत्पन्न हो गई क्योंकि उनकी नागरिकता पर ही संदेह जताया जा रहा था।

इस झमेले से निश्चित ही आनन्द ने भीतर तक अपमानित महसूस किया होगा, हालांकि वे इतने सज्जन, शर्मीले और भोले हैं कि उन्होंने अपनी पत्नी अरुणा से अपने पासपोर्ट की कॉपी मंत्रालय भेजने को कहा, जिसका मंत्रालय के अघाये हुए अधिकारियों-बाबुओं ने कोई जवाब नहीं दिया। एक केन्द्रीय विवि और विश्व के सर्वोच्च खिलाड़ी के इस अपमान के मामले की शिकायत जब राष्ट्रपति प्रतिभादेवी सिंह पाटिल को की गई तब कहीं जाकर कपिल सिब्बल साहब ने खुद विश्वनाथन आनन्द को फ़ोन करके उनसे माफ़ी माँगी और उन्हें हुई “असुविधा”(?) के लिए खेद व्यक्त किया। आनन्द तो वैसे ही भोले-भण्डारी हैं, उन्होंने भी तड़ से माफ़ी देते हुए सारे मामले का पटाक्षेप कर दिया। (जबकि हकीकत में विश्वनाथन आनन्द संसद में बैठे 700 से अधिक सांसदों से कहीं अधिक भारतीय हैं, एक “परिवार विशेष” से अधिक भारतीय हैं जिसके एक मुख्य सदस्य ने विवाह के कई साल बाद तक अपना इटली का पासपोर्ट नहीं लौटाया था, और किसी नौकरशाह ने उनकी नागरिकता पर सवाल नहीं उठाया…)

पूरे मामले को गौर से और गहराई से देखें तो साफ़ नज़र आता है कि -

1) नौकरशाही ने यह बेवकूफ़ाना कदम या तो “चरण वन्दना” के लिये किसी खास व्यक्ति को खुश करने अथवा किसी के इशारे पर उठाया होगा…

2) नौकरशाही में इतनी अक्ल, समझ और राष्ट्रबोध ही नहीं है कि किस व्यक्ति के साथ कैसे पेश आना चाहिये…

3) नौकरशाही में “व्यक्ति विशेष” देखकर झुकने या लेटने की इतनी गन्दी आदत पड़ चुकी है कि देश के “सम्मानित नागरिक” क्या होते हैं यह वे भूल ही चुके हैं…

4) इस देश में 2 करोड़ से अधिक बांग्लादेशी (सरकारी आँकड़ा) अवैध रुप से रह रहे हैं, इस नौकरशाही की हिम्मत नहीं है कि उन्हें हाथ भी लगा ले, क्योंकि वह एक “समुदाय विशेष का वोट बैंक” है…। बांग्लादेश से आये हुए “सेकुलर छोटे भाईयों” को राशन कार्ड, ड्रायविंग लायसेंस और अब तो UID भी मिल जायेगा, लेकिन आनन्द से उनका पासपोर्ट भी माँगा जायेगा…

5) इस देश के कानून का सामना करने की बजाय भगोड़ा बन चुका और कतर की नागरिकता ले चुका एक चित्रकार(?) यदि आज भारत की नागरिकता चाहे तो कई सेकुलर उसके सामने “लेटने” को तैयार है… लेकिन चूंकि विश्वनाथन आनन्द एक तमिल ब्राह्मण हैं, जिस कौम से करुणानिधि धुर नफ़रत करते हैं, इसलिये उनका अपमान किया ही जायेगा। (पाकिस्तानी नोबल पुरस्कार विजेता अब्दुस सलाम का भी अपमान और असम्मान सिर्फ़ इसलिये किया गया था कि वे “अहमदिया” हैं…)

6) दाऊद इब्राहीम भी कई साल से भारत के बाहर रहा है और अबू सलेम भी रहा था, लेकिन सरकार इस बात का पूरा खयाल रखेगी कि जब वे भारत आयें तो उन्हें उचित सम्मान मिले, 5 स्टार होटल की सुविधा वाली जेल मिले और सजा तो कतई न होने पाये… इसका कारण सभी जानते हैं…

7) विश्वनाथन आनन्द की एक गलती यह भी है कि, मोहम्मद अज़हरुद्दीन “सट्टेबाज” की तरह उन्होंने यह नहीं कहा कि “मैं एक अल्पसंख्यक ब्राह्मण हूं इसलिये जानबूझकर मेरा अपमान किया जा रहा है…, न ही वे मीडिया के सामने आकर ज़ार-ज़ार रोये…” वरना उन्हें नागरिकता तो क्या, मुरादाबाद से सांसद भी बनवा दिया जाता…

8 ) विश्वनाथन आनन्द की एक और गलती यह भी है कि उनमें “मदर टेरेसा” और “ग्राहम स्टेंस” जैसी सेवा भावना भी नहीं है, क्योंकि उनकी नागरिकता पर भी आज तक कभी कोई सवाल नहीं उठा…

असल में भारत के लोगों को और नौकरशाही से लेकर सरकार तक को, “असली हीरे” की पहचान ही नहीं है, जो व्यक्ति स्पेन में रहकर भी भारत का नाम ऊँचा हो इसलिये “भारतीय” के रुप में शतरंज खेलता है, उसके साथ तो ऐसा दुर्व्यवहार करते हैं, लेकिन भारत और उसकी संस्कृति को गरियाने वाले वीएस नायपॉल को नागरिकता और सम्मान देने के लिये उनके सामने बिछे जाते हैं। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है, कि जहाँ विदेश में किसी भारतीय मूल के व्यक्ति ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर कुछ मुकाम हासिल किया कि मूर्खों की तरह हें हें हें हें हें हें करते हुए उसके दरवाजे पर पहुँच जायेंगे कि “ये तो भारतीय है, ये तो भारतीय है, इनके वंशज तो भारत से आये थे…”, सुनीता विलियम्स हों या बॉबी जिन्दल, उनका भारत से कोई लगाव नहीं है, लेकिन हमारे नेता और अधिकारी हैं कि उनके चरणों में लोट लगायेंगे… सानिया मिर्ज़ा शादी रचाकर पाकिस्तान चली गईं, लेकिन इधर के अधिकारी और नेता उसे कॉमनवेल्थ खेलों में “भारतीय खिलाड़ी” के रुप में शामिल करना चाहते हैं… यह सिर्फ़ चमचागिरी नहीं है, भुलाये जा चुके आत्मसम्मान की शोकांतिका है…।

स्पेन सरकार ने, विश्वनाथन आनन्द के लिये स्पेन की नागरिकता ग्रहण करने का ऑफ़र हमेशा खुला रखा हुआ है। एक और प्रसिद्ध शतरंज खिलाड़ी तथा आनन्द के मित्र प्रवीण ठिप्से ने बताया कि स्पेन ने विश्वनाथन आनन्द को “स्पेनिश” खिलाड़ी के रुप में विश्व शतरंज चैम्पियनशिप में खेलने के लिये “5 लाख डॉलर” का प्रस्ताव दिया था, जिसे आनन्द ने विनम्रता से ठुकरा दिया था कि “मैं भारत के लिये और भारतीय के नाम से ही खेलूंगा…” उस चैम्पियनशिप को जीतने पर विश्वनाथन आनन्द को भारत सरकार ने सिर्फ़ “5 लाख रुपये” दिये थे… जबकि दो कौड़ी के बॉलर ईशान्त शर्मा को IPL में सिर्फ़ 6 मैच खेलने पर ही 6 करोड़ रुपये मिल गये थे…

बहरहाल, आनन्द के अपमान के काफ़ी सारे “सम्भावित कारण” मैं गिना चुका हूं… अब अन्त में विश्वनाथन आनन्द के अपमान और उनके साथ हुए इस व्यवहार का एक सबसे मजबूत कारण देता हूं… नीचे चित्र देखिए और खुद ही समझ जाईये…। यदि आनन्द ने सोहराबुद्दीन, शहाबुद्दीन, पप्पू यादव, कलमाडी या पवार के साथ शतरंज खेली होती तो उनका ऐसा अपमान नहीं होता… लेकिन एक “राजनैतिक अछूत” व्यक्ति के साथ शतरंज खेलने की हिम्मत कैसे हुई आनन्द की?

भारत की “चरणचूम चापलूस-रीढ़विहीन” नौकरशाही आप सभी को मुबारक हो… जय हो।

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