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लेनिन के शव से हमें क्या मतलब है यार…?

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मॉस्को (रूस) में बोल्शेविक क्रांति के नेता व्लादिमीर लेनिन का शव उनकी मौत के पश्चात रासायनिक लेप लगाकर सन 1924 से रखा हुआ है। मॉस्को के लाल चौक पर एक म्यूजियम में रखे हुए व्लादिमीर लेनिन के इस शव (बल्कि “ममी” कहना उचित है) को देखने देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। हाल ही में रूस की यूनाइटेड रशिया पार्टी (वहाँ की सरकारी राजनैतिक पार्टी) ने ”www.goodbyelenin.ru” वेबसाइट पर एक सर्वे करवाया कि “क्यों न अब लेनिन के शव को वहाँ से निकालकर दफ़ना दिया जाये…” पाठकों से “हाँ” या “ना” में जवाब माँगे गये थे। लेनिन के शव को दफ़नाया जाये अथवा नहीं इसे लेकर रूस के विभिन्न इलाके के 1600 लोगों की राय ली गई। वैसे रूस की सरकार सैद्धान्तिक रुप (Michael Gorbachev’s View) से लेनिन के शव को दफ़नाने की इच्छुक है।

यह तो हुई उस देश की बात… लेनिन (Vladimir Lenin) के शव को दफ़नाने की बात पर हजारों किमी दूर यहाँ भारत में वामपंथियों ने प्रदर्शन कर डाला (नीचे का चित्र देखें…)। सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ़ इंडिया (कम्युनिस्ट) (SUCI) के कार्यकर्ताओं ने बंगलोर में रूस के इस कदम की आलोचना की और रूस विरोधी नारे लगाये… एक ज्ञापन सौंपा गया और माँग की गई कि लेनिन के शव को नहीं दफ़नाया जाये…। (यह खबर पढ़कर कुछ को हँसी आ रही होगी, कुछ को आश्चर्य हो रहा होगा, जबकि कुछ को वामपंथी “बौद्धिक कंगलेपन” पर गुस्सा भी आ रहा होगा)… अब आप खुद ही सोचिये कि रूस की सरकार, लेनिन के शव को दफ़नायें या जलायें या वैसे ही रखे रहें, इससे भारत के लोगों को क्या मतलब? कहाँ तो एक तरफ़ वामपंथी लोग आये दिन “हिन्दू प्रतीकों” को दकियानूसी बताकर खुद को “नास्तिक” प्रचारित करते फ़िरते हैं और कहाँ तो लेनिन की बरसों पुरानी लाश को लेकर इतने भावुक हो गये कि यहाँ भारत में प्रदर्शन कर डाला? कहाँ तो वे हमेशा “वैचारिक जुगालियों” और “बौद्धिक उल्टियों” के जरिये भाषण-दर-भाषण पेलते रहते हैं और लेनिन के शव को दफ़नाने के नाम से ही उन्हें गुस्सा आने लगा? क्या लेनिन के शव को दफ़नाने से उनके विचार खत्म हो जाएंगे? नहीं। तो फ़िर किस बात का डर? सरकार रूस की है, लेनिन रूस के हैं… वह उस “ममी” के साथ चाहे जो करे… यहाँ के वामपंथियों के पेट में मरोड़ उठने का कोई कारण समझ नहीं आता।

लेकिन जो लोग यहाँ की जड़ों से कटे हुए हों, जिनके प्रेरणास्रोत विदेशी हों, जिनकी विचारधारा “बाहर से उधार” ली हुई हो… वे तो ऐसा करेंगे ही, इसमें आश्चर्य कैसा? चीन में बारिश होती है तो ये लोग इधर छाता खोल लेते हैं, रूस में सूखा पड़ता है तो इधर के वामपंथी खाना कम कर देते हैं, क्यूबा में कास्त्रो (Fidel Castro) की तबियत खराब होती है तो भारत में दुआएं माँगने लग पड़ते हैं… ऐसे विचित्र किस्म के लोग हैं ये।

लेनिन का शव अगले सौ साल रखा भी रहे या दफ़ना दिया जाये, उससे हमें क्या लेना-देना? हद है मानसिक दिवालियेपन और फ़ूहड़ता की…। मजे की बात तो यह है कि इस सर्वे में भाग लेने वाले 1600 लोगों में से 74% लोग लेनिन को दफ़नाने के पक्ष में थे और 26% उसे रखे रहने के…। जो 26% लोग लेनिन के शव को बनाये रखना चाहते हैं उनमें भी बड़ा प्रतिशत ऐसा इसलिये कह रहा है कि क्योंकि “लेनिन के शव से पर्यटक आते हैं…” (यानी श्रद्धा-वद्धा कुछ नहीं, कमाई होती है इसलिये)। साफ़ है कि रूस के लोग तो वामपंथ के खोखले आदर्शों से काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं, चीन तो कभी का वाम विचारधारा को तिलांजलि दे चुका है… लेकिन इधर भारत में अभी भी ये लोग इसे मुँह तक ओढ़े बैठे हैं, जबकि बाहर दुनिया बदल चुकी है… इन्हें पता ही नहीं है। जब कोई “राष्ट्रवाद” की बात करता है तो ये कुनैन की गोली खाये जैसा मुँह बनाते हैं… हिन्दुत्व को कोसते-कोसते अब ये भारतीय संस्कृति और भारत की मिट्टी से पूर्णतः कट चुके हैं…। इन्हें तो यह भी पता नहीं है कि आदिवासी इलाकों में इस “कथित वामपंथ” को अब “चर्च” अपने हित साधने के लिये “चतुर स्टाइल” से टिश्यू पेपर की तरह इनका इस्तेमाल कर रहा है…

बहरहाल, चलते-चलते यह भी जानते जाईये कि मुम्बई हमले के अमर शहीद संदीप उन्नीकृष्णन (Sandeep Unnikrishnan) की शवयात्रा में केरल की वामपंथी सरकार का एक भी नुमाइन्दा मौजूद नहीं था…(शायद संदीप के पिता द्वारा अच्युतानन्दन को घर से धकियाए जाने का बदला ले रहे होंगे…), और अब संदीप के चाचा ने कसाब (Ajmal Kasab) और अफ़ज़ल (Afzal Guru) को दामाद बनाये रखने के विरोध में आत्मदाह कर लिया, तब भी वामपंथियों ने कोई प्रदर्शन नहीं किया, ज़ाहिर है कि उन्हें लेनिन के शव की चिन्ता अधिक है…, ठीक उसी प्रकार जैसे छत्तीसगढ़ में एक “कथित मानवाधिकारवादी” के जेल जाने की चिन्ता अधिक है, लेकिन पिछले 10-12 दिनों से अपहृत पुलिस के जवानों की कोई चिन्ता नहीं…।

अब आप सोच-सोचकर माथा पीटिये, कि लेनिन को दफ़नाने या न दफ़नाने से भारत का क्या लेना-देना है यार…?

स्रोत :
http://www.sify.com/news/60-percent-of-russians-want-lenin-s-body-to-be-buried-news-international-lcdjucbghia.html

http://news.in.msn.com/international/article.aspx?cp-documentid=4831649

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j c के द्वारा
May 25, 2014

भारत में जो लोग विश्वकुटम्बकम् का नारा देते हैं, वे पूरी दुनिया को मूर्ख बनाते हैं, और अपने पड़ोसियों की तरक्की से जलते हैं, अगर भारत में कोई बड़ी दुर्घटना हुयी तो पूरी दुनिया ने उसका विरोध किया , अगर रूस में कोई दुइर्घटना हुयी तो पूरी दुनिया में उसका विरोध हुआ, दुनिया के जो लोग चित भी अपनी और पट भी अपनी के सिद्धांत पर बात करते हैं वे पूरी दुनिया और जिस देश में रहते हैं उन्हें और अपने आस पड़ोस में रहने वाले लोगों को मूर्ख बनाते रहते हैं, भारत के सोशलिस्टों ने अगर रूस में ब्लादीमिर लेनिन के सव को दफनाने का विरोध किया है तो यह उनके विस्तृत सोच की महानता है, जब १९१७ की समाजवादी क्रांति के पश्चात लेनिन ने बहुमत के आदेश से सत्ता संभाली तो उसी सासन काल में लेनिन की मृत्यु हुए और उस सासन ने उनके सव को एक सुरक्षित ममी की धरोहर के रूप में दुनिया में एक नया इतिहास बनाने के लिए राखी है तो वर्तमान सत्ता को विरोध क्यों और अगर भारत में उसका विरोध हुआ हैं तो सीमित सोच के लोग सोशलिस्ट सेंटर ऑफ़ इंडिया के कार्यकर्ताओं के कार्य par ब्यंग क्यों कर रहे हैं, अरे नादानों अगर आप यही कहते हो तो सदियों से शोसक सम्राटों ने इस देश के कमजोरों, निर्धनों , पिछड़ों और दलितों को सदियों से लूटा है तो क्या उनके महल किले तमाम रहने चाहिए ? क्यों उनको आप याद करते हो, मैं जब उन किलों में देखने जाता हूँ तो अंदर जाकर समझने लगता हूँ और सदियों से चलते उनके जुल्मो की फिल्म सी अंतर्मन में दौड़ने सुरु हो जाती है कि आज से सैकड़ों साल पहले हमारे पूर्वज, यहां गुलामों की हैसियत से आते थे और सर झुका कर इन महलों में रहने वाले लुटेरों के अगले आदेश का इन्तजार करते थे, की उस गुलाम की गर्दन काटने का आदेश होगा या सौ कोड़े खाने का आदेश, फासिस्ट राजा के सामंत राज्य में जिस किसी की कन्या या औरत को पसंद करते थे उसके पति और पिता या उस परिवार के पुरुषों को अपराध में फंसा कर मौत की सजा दे देते थे या आजीवन जेलों की सलाखों में डाल देते थे, , और उसकी औरत या पुत्री को अपनी गुलाम दासी बना कर उसका जब तक वह जवान है शारीरिक भोग और मानसिक शोसन करते रहते थे , ऐसा ही सिद्धांत था, सदियों से दुनिया में चल रहे , फासिस्ट और तानासाही राजतंत्र का ?? कैसा रहा होगा वह वक्त, अपनी बुद्धि में जोर डालने का प्रयास अवस्य करो ??. क्योंकि इस धरती का कोई भी राजतंत्र समानता बंधुता और एकता की बात नहीं करता था , उसका सिद्धांत था शोषण करना राजतंत्र का मूल सिद्धांत था , गुलाम और मालिक, ताकतवर मालिक और कमजोर गुलाम , हमने इतिहास में पड़ा भी है कि उस काल में उनके राज्य में धर्म गुरु होता था , और भारत में धर्म गुरु ब्राह्मणवादी ही हुआ करता था , उसने राजा की एक परिभासा भी बनायी हुयी थी , जो कि इतिहास के मुताबिक़ प्रचलित थी, कि राजा भगवान का भेजा हुआ प्रतिनिधि है , और उसका आदेश भगवान का आदेश माना जाएगा और उसी सिद्धांत से वह समाज को मूर्ख बनाते फिरते थे , उस काल के राजाओं के साम्राज्य और राज्य इसी प्रकार से चलते थे, जो उनका आदेश नहीं मानता था, उन्हें मृत्यु , कोड़े, और भयंकर aur कष्टप्रद और यातना भरी जेलों में गल गल और सड़ सड़ कर मरना पड़ता था ?? आज जो उक्त विचारों को ब्यक्त कर रहा है वह कुंठित विचारों का और संकीर्ण मानसिकता का ब्यक्ति है ???

bharodiya के द्वारा
July 29, 2011

वामपंथ खूद एक धर्म बन गया है, कट्टरवादी धर्म । उन के ईष्ट देव है लेनिन और माओ । लेनिन के देश की औरते, ईन लाल्भाईयो की बेहने, आज भारत के शेहरो मे अपने शरीर का धन्धा करने आती है । लेनिन के मुल बच्चे लेनिन के पाप की वजह से दुखी है । वो तो लेनिन का नामो निशान मिटाना चाहेन्गे । भले रोते-बिलख्ते रहे लेनिन के गोद लिये बच्चे, उसकी नाजायज औलादे । ऐसे टिस्यु पेपर से तो पिछवाडा और खराब होगा ना ।

    j c के द्वारा
    May 25, 2014

    मित्र पहले हिंदी का अच्छा ज्ञान प्राप्त करो और हिंदी में अच्छा लिखना सीखो तब इतिहास को अवस्य पढ़ना, क्योंकि आपने इतिहास को सही ढंग से नहीं पढ़ा है, क्योंकि आपको मैं समझता हूँ बिलकुल ही ज्ञान ही नहीं है, मैंने ऊपर जो कुछ तर्क दिया है, उचित लगे तो अवस्य उसका रिप्लाई करना, पुनः मैं उसे अवस्य देखूंगा अगर आपकी नजर में यह लेख पुनः नजर आये तो अवस्य रिप्लाई देना ??


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