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राष्ट्रवाद की भावना मर चुकी है हमारी? - चार देशों की तुलना…

Posted On: 20 Feb, 2011 Others में

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हाल ही में एक और पाकिस्तानी “सोफ़िस्टिकेटेड भिखमंगे” राहत फ़तेह अली खान को भारतीय कस्टम अधिकारियों ने गैरकानूनी रूप से सवा लाख डालर की राशि अपने साथ दुबई ले जाते हुए पकड़ा। स्पष्ट तौर पर यह सारा पैसा उसका अकेले का नहीं था, और न ही कानूनी रुप से उसने यहाँ कमाया। निश्चित रुप से यह पैसा, भारतीय फ़िल्म उद्योग में “ऊँचे-ऊँचे आदर्श बघारने” और “आये दिन सेकुलर नसीहतें” वाले कुछ फ़िल्मकारों एवं संगीतकारों का है जो कि हवाला रैकेट के जरिये पाकिस्तान होते हुए दुबई पहुँचता रहा है। (Rahat Fateh Ali Khan and Hawala Racket)

खैर “हवाला कनेक्शन” एक अलग मामला है और जब इतनी बड़ी राशि के स्रोतों की जाँच होगी तो कुछ चौंकाने वाले भारतीय नाम भी सामने आ सकते हैं… परन्तु इस लेख में मैं पाठकों के सामने इस मुद्दे से जुड़े “राष्ट्रवाद” के पहलू पर चार विभिन्न उदाहरण देकर ध्यान आकर्षित करवाना चाहता हूँ…

केस क्रमांक 1) – इंग्लैण्ड में पाकिस्तान के तीन क्रिकेट खिलाड़ी (फ़िर पाकिस्तानी) मोहम्मद आसिफ़, आमेर और सलमान बट को “स्पॉट फ़िक्सिंग” (Spot Fixing and Pakistan)  के मामले में दोषी पाया गया। एक जुआरी (बुकी) ने कैमरे पर इन तीनों का नाम भी लिया और एक वीडियो में ये तीनों खिलाड़ी उस सट्टेबाज से “कोट” की अदला-बदली करते दिखाई दिये (ज़ाहिर है कि कोट में इन खिलाड़ियों को मिलने वाला पैसा ठुंसा हुआ था)। इस मामले में ब्रिटेन “अपने देश के कानूनों” के मुताबिक इन तीनों खिलाड़ियों के खिलाफ़ केस दर्ज किया, मामले की जाँच की, उन्हें दोषी भी पाया और इस लिखित शर्त पर, कि जब भी इस केस में सुनवाई और सजा के लिये इनकी जरुरत पड़ेगी तभी उन्हें पाकिस्तान जाने की इजाजत दी गई…

केस क्रमांक 2) – अमेरिका के “ट्राईवैली” (Tri-Valley University Fraud)  नामक फ़र्जी विश्वविद्यालय ने भारत के कुछ छात्रों को धोखाधड़ी से “एडमिशन” का झाँसा देकर पैसा वसूल कर लिया। भारत के ये छात्र उस समय अमेरिका में पकड़े गये, जब जाँच में पाया गया कि वह यूनिवर्सिटी फ़र्जी है और इसलिये ये छात्र बिना वैध अनुमति के अमेरिका में “घुसपैठ” के दोषी माने गये। इन छात्रों को “अमेरिका के कानूनों और नियमों” के मुताबिक इनके पैरों में बेड़ीनुमा इलेक्ट्रानिक उपकरण लगाकर रखने को कहा गया, जिससे यह छात्र किस जगह पर हैं यह पुलिस को पता चलता रहे…

केस क्रमांक 3) – पाकिस्तान में एक अमेरिकी रेमंड डेविस (Raymond Davis in Pakistan)  अपनी कार से जा रहा था, जिसे बीच रास्ते में दो लोगों ने मोटरसाइकल अड़ाकर रोका। तब उस अमेरिकी डेविस ने कार में से ही उन दोनों लोगों को गोली से उड़ा दिया, और अमेरिकी दूतावास से तत्काल मदद भी माँग ली। मदद के लिये आने वाली गाड़ी ने भी एक पाकिस्तानी को सड़क पर ठोक दिया और वह भी मारा गया, उसके गम में उसकी विधवा ने भी आत्महत्या कर ली। अब पाकिस्तान ने डेविस को पकड़ रखा है और “अपने देश के कानूनों” के अनुसार सजा देने की बात कर रहा है… पाकिस्तान में आक्रोश की लहर है।

केस क्रमांक 4)- जी हाँ, यही राहत फ़तेह अली खान (Pakistan Thanks Chidambaram)  वाला, जिसके बारे में विस्तार से सभी को पता ही है…

अब जैसा कि सभी जानते हैं, जैसे ही राहत फ़तेह अली खान को अवैध धनराशि के साथ पकड़ा गया उसी समय तत्काल पाकिस्तान ने आसमान सिर पर उठाना शुरु कर दिया। पाकिस्तान के गृहमंत्री और विदेश सचिवों ने भारत सरकार के सामने कपड़े फ़ाड़-फ़ाड़कर अपना रोना शुरु कर दिया… हमारे सेकुलर चैनलों ने मोटे तौर पर राहत के “अपराध” को हल्का-पतला बनाने और बताने की पुरज़ोर कोशिश की और पाकिस्तान द्वारा “भारत-पाकिस्तान के सम्बन्धों में दरार” जैसी गीदड़ भभकी के सुर में सुर मिलाते हुए हुँआ-हुँआ करना शुरु कर दिया… इन सभी के साथ जुगलबन्दी करने में महेश भट्ट (Mahesh Bhatt son with Hadley connection)  तो सदा की तरह “सेकुलर चैम्पियन” बनने की कोशिश कर ही रहे थे।

इस सारी “बुक्का-फ़ाड़ कवायद” का नतीजा यह निकला कि राहत फ़तेह अली खान को हिरासत में लेना तो दूर, भारतीय एजेंसियों ने 48 घण्टे तक यही तय नहीं किया कि FIR कैसी बनाई जाये और रिपोर्ट किन धाराओं में दर्ज की जाये, ताकि कहीं “सेकुलरिज़्म” को धक्का न पहुँच जाये और “अमन की आशा” (Aman ki Aasha)  का बलात्कार न हो जाये।

इन चारों मामलों की आपस में तुलना करने पर साफ़ नज़र आता है कि भारत चाहे खुद ही अपने “महाशक्ति” होने का ढोंग रचता रहे, “दुनिया में अपने कथित असर” का ढोल पीटता रहे, अपनी ही पीठ थपथपाता रहे… हकीकत यही है कि भारत के नेताओं और जनता के एक बड़े हिस्से में “राष्ट्रीय स्वाभिमान” और “राष्ट्रवाद” की भावना बिलकुल भी नहीं है। कड़वा सच कहा जाये तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की “इज्जत” दो कौड़ी की भी नहीं है, “दबदबा” तो क्या खाक होगा। ये हाल तब है जब भारत की जनता का बहुमत प्रतिशत जवानों का है परन्तु दुर्भाग्य से इस “जवान देश” पर ऐसे नेता राज कर रहे हैं और कब्जा जमाए बैठे हैं जो कभी भी कब्र में टपक सकते हैं।

ऊपर की चारों घटनाओं का संक्षिप्त विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि पहली घटना में इंग्लैण्ड ने पाकिस्तान को दो टूक शब्दों में कह दिया कि खिलाड़ियों पर अपराध सिद्ध हुआ है, वीडियो में पकड़े गये हैं, केस चलेगा और सजा भी अदालत ब्रिटिश कानूनों के मुताबिक देगी… शुरुआत में पाकिस्तान ने थोड़ी सी चूं-चपड़ की और हमेशा की तरह “पाकिस्तानियों की छवि (हा हा हा हा हा हा हा) को खराब करने की साजिश” बताया, लेकिन ब्रिटेन ने उसे कड़े शब्दों में समझा दिया कि जो भी होगा कानून के मुताबिक होगा… जल्दी ही पाकिस्तान को समझ में आ गया और उसकी आवाज़ बन्द हो गई।

दूसरे मामले में भारत के छात्रों को फ़र्जी यूनिवर्सिटी की गलती की वजह से विपरीत परिस्थितियों से गुज़रना पड़ा, लेकिन अमेरिका ने “अपने आव्रजन एवं घुसपैठ के नियमों” का हवाला देते हुए उन्हें एक कैदी की तरह पैरों में इलेक्ट्रोनिक बेड़ियाँ (Tri-Valley Radio Tagging)  लगाकर घूमने का निर्देश दिया…। भारत वाले चिल्लाते रहे, ओबामा तक ने ध्यान नहीं दिया… हमारी दो टके की औकात बताते हुए साफ़ कर दिया कि “जो भी होगा कानून के तहत होगा…”।

तीसरा मामला मजेदार है, इसमें पहली बार पाकिस्तान को अमेरिका की बाँह मरोड़ने का मौका मिला है और वह फ़िलहाल वह अब तक इसमें कामयाब भी रहा है। अमेरिका ने डेविस को छोड़ने के लिये पाकिस्तान पर दबाव और धमकियों का अस्त्र चलाया, डॉलर की भारी-भरकम मदद बन्द करने की धमकी दी… अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्तों में दरार आ जायेगी, ऐसा भी हड़काया… लेकिन पाकिस्तान ने डेविस को छोड़ने से “फ़िलहाल” इंकार कर दिया है और कहा है कि “पाकिस्तान के कानूनों के मुताबिक जो भी सजा डेविस को मिलेगी, न्यायालय जो निर्णय करेगा वही माना जायेगा…”। “फ़िलहाल” शब्द का उपयोग इसलिये किया क्योंकि डेविस को लेकर पाकिस्तान अपनी “सदाबहार घटिया सौदेबाजी” करने पर उतरने ही वाला है… और पाकिस्तान ने अमेरिका को “ऑफ़र” किया है कि वह डेविस के बदले में पाकिस्तान के एक खूंखार आतंकवादी (यानी हाफ़िज़ सईद जैसा “मासूम”) को छोड़ दे। अभी उच्च स्तर पर विचार-विमर्श जारी है कि डेविस के बदले डॉलर लिये जायें या “मासूम”।

और अन्त में चौथा मामला देखिये, राहत फ़तेह अली खान को लेकर उधर पाकिस्तान के मीडिया ने कपड़े फ़ाड़ना शुरु किया, इधर हमारे “सेकुलर मीडिया” ने भी उसके सुर में सुर मिलाना शुरु किया, महेश भट्ट-अरुंधती जैसे “टट्टू” भी भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों की दुहाईयाँ देने लगे…। सरकार ने क्या किया… पहले तो सिर्फ़ पूछताछ करके छोड़ दिया, फ़िर पासपोर्ट जब्त किया… और थोड़ा हल्ला मचा, तो दोबारा गिरफ़्तारी की नौटंकी करवा दी… लेकिन 48 घण्टे तक न तो आधिकारिक FIR दर्ज हुई और न ही धाराएं तय हुईं…। सोचिये, जब एक भिखमंगा देश (जो दान के अमेरिकी डॉलरों पर गुज़र-बसर कर रहा है) तक अपने अन्नदाता अमेरिका को आँख दिखा देता है, और एक हम हैं जो खुद को “दुनिया के सबसे बड़े उभरते बाज़ार” को लेकर मगरूर हैं, लेकिन “स्वाभिमान” के नाम पर जीरो…

हमारे देश के नेता हमेशा इतना गैर-स्वाभिमानी तरीके से क्यों पेश आते हैं? राहत खान की सफाई ये है कि उन्हें सवा लाख डॉलर एक प्रोग्राम के एवज में मिले हैं। जबकि कानून के अनुसार अगर कोई व्यक्ति भारत में पैसा कमाता है तो उसे भारतीय करेंसी में ही पेमेंट हो सकता है। राहत फतेह अली खान के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पिछले साल दिसंबर महीने में भी राहत को तय सीमा से ज्यादा नकद ले जाने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया था। सूत्रों का कहना है कि उस वक्त उनके पास ज्यादा कैश नहीं था इसलिए उन्हें सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था। सूत्रों का यह भी कहना है कि उन्होंने अपने 7 बड़े कार्यक्रमों की कमाई का 5.4 करोड़ रुपया दुबई के रास्ते लाहौर हवाला के जरिए ही पहुंचवाया (और हम निकम्मों की तरह “सेकुलरिज़्म” की चादर ओढ़े सोये रहे)। यह आदमी ऐसा कैसा “सूफ़ी गायक” है? क्या यही सूफ़ी परम्परा की नौटंकी है, कि “हिन्दी फ़िल्म में मुफ़्त में गाता हूँ…” कहकर चुपके से करोड़ों रुपया अंटी करता रहता है? (Rahat got money for programmes) इससे पहले भी एक और पाकिस्तानी गायक अदनान सामी (Adnan Sami Purchased Property in India) ने मुम्बई में 20 करोड़ रुपये की सम्पत्ति खरीद ली… भ्रष्टाचार में गले-गले तक सने हुए हमारे देश के अधिकारियों ने आँखें मूंदे रखीं, जबकि कोई पाकिस्तानी व्यक्ति भारत में स्थायी सम्पत्ति खरीद ही नहीं सकता… और “सेकुलरिज़्म” का हाल ये है कि भारत का कोई व्यक्ति पाकिस्तान तो छोड़िये, कश्मीर में ही ज़मीन नहीं खरीद सकता…।

राहत फ़तेह या अदनान सामी के मामले तो हुए तुलनात्मक रूप से “छोटे मामले” यानी आर्थिक अपराध, टैक्स चोरी और हवाला… लेकिन हम तो इतने नाकारा किस्म के लोग हैं कि देश की राजधानी में सरकार की नाक के नीचे यानी संसद पर हमले के दोषी को दस साल से खिला-पिला रहे हैं, आर्थिक राजधानी मुम्बई पर हमला करने वाला मजे मार रहा है और उसकी सुरक्षा में करोड़ों रुपया फ़ूँक चुके हैं… और ऐसा नहीं है कि ये पिछले 10-15 साल में आई हुई कोई “धातुगत कमजोरी” है, हकीकत तो यह है कि आज़ादी के बाद से ही हमारे नेताओं ने देश के स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ किया है, न तो खुद कभी रीढ़ की हड्डी वाले बने और न ही जनता को ऐसा बनने दिया। पुरुलिया हथियार काण्ड (Purulia Arms Drop Case) के बारे में सभी लोग जानते हैं, एक विदेशी व्यक्ति हवाई जहाज लेकर आता है, भारत में हथियार गिराता है, हम उसे गिरफ़्तार करते हैं और रूस, लातविया और डेनमार्क द्वारा सिर्फ़ एक बार “डपट” दिये जाने पर दुम दबाकर उसे छोड़ देते हैं…। भोपाल में गैस लीक (Bhopal Gas Tragedy and Anderson) होती है, 15000 से अधिक इंसान मारे जाते हैं… और हम “”घिघियाए हुए कुत्ते” की तरह वॉरेन एण्डरसन की आवभगत भी करते हैं और उसे आराम से घर जाने देते हैं। देश की सबसे बड़ी (उस समय के अनुसार) पहली “लूट” यानी बोफ़ोर्स के आरोपी को हम उसके घर जाकर “क्लीन चिट” दे आते हैं… देश के भ्रष्ट और निकम्मे लोगों में कोई हलचल, कोई क्रान्ति नहीं होती।

1) पाकिस्तानी फ़िल्म “सरगम” में अदनान सामी की बीवी ज़ेबा के लिये आशा भोंसले ने “प्लेबैक” दिया था… पाक अधिकारियों ने फ़िल्म को तब तक प्रदर्शित नहीं होने दिया… जब तक अदनान सामी ने आशा भोंसले के गाने हटाकर हदिया कियानी की आवाज़ में गाने दोबारा रिकॉर्ड नहीं करवा लिये…

2) (वैसे ऐसा कभी होगा नहीं फ़िर भी) कल्पना कीजिये कि लाहौर हवाई अड्डे पर सोनू निगम सवा लाख डालर के साथ पकड़ा जाये और उस पैसे का हिसाब न दे तो उसके साथ क्या होगा?

3) “सेकुलरिज़्म की गन्दगी” का उदाहरण भी देखिये कि, जब देश के एक राज्य के सबसे सफ़ल मुख्यमंत्री को अमेरिका वीज़ा नहीं देता (Narendra Modi Denied Visa to US) तो यह मीडिया द्वारा यह “देश का अपमान” नहीं कहलाता, लेकिन जब एक “नचैये-भाण्ड” (Shahrukh Khan Detained at US Airport) को एयरपोर्ट पर नंगा करके तलाशी ली जाती है (वहाँ के कानूनों के मुताबिक) तो भूचाल आ जाता है और समूची “शर्मनिरपेक्षता” खतरे में आ जाती है…

उधर चीन अपनी हवाई सीमा में घुस आये अमेरिका के लड़ाकू विमानों को रोक लेता है और जब तक अमेरिका की नाक मोरी में नहीं रगड़ लेता, तब तक नहीं छोड़ता… जबकि इधर हमारी कृपा से ही आज़ाद हुआ बांग्लादेश सीमा सुरक्षा बल के जवानों की हत्या करके जानवरों की तरह उनकी लाशें टाँगकर भेजता है और हम सिर्फ़ “चेतावनी”, “बातचीत”, “कूटनीतिक प्रयास” इत्यादि में ही लगे रहते हैं…। प्रखर “राष्ट्रवाद” की भावना देशवासियों के दिल में इतनी नीचे क्यों चली गई है? दुनिया की तीसरी (या चौथी) सबसे बड़ी सेना, हर साल खरबों रुपये की हथियार खरीद, परमाणु अस्त्र-शस्त्र, मिसाइलें-टैंक… यह सब क्या “पिछवाड़े” में रखने के लिये हैं?

इस सवाल का जवाब ढूंढना बेहद आवश्यक है कि “राष्ट्र स्वाभिमान”, “गौरव” और “प्रखर राष्ट्रवाद” इतना क्यों गिर गया है, कि कोई भी ऐरा-गैरा देश हमें पिलपिलाये हुए चूहे की तरह क्यों लतिया जाता है और हम हर बार सिर्फ़ हें-हें-हें-हें-हें-हें करते रह जाते हैं? विदेशों में सरेआम हमारे देश का और देशवासियों का अपमान होता रहता है और इधर कोई प्रदर्शन तक नहीं होता, क्या इस पराजित मनोवृत्ति का कारण –

1) “नेहरुवादी सेकुलरिज़्म” है?

2) या “मैकाले की गुलाम बनाने वाली शिक्षा” है?

3) या “गाँधीवादी अहिंसा” का नपुंसक बनाने वाला इंजेक्शन है?

4) या अंग्रेजों और मुगलों की गुलामी का असर अब तक नहीं गया है?

5) या कुछ और है?

या सभी कारण एक साथ हैं? आपको क्या लगता है…? एक मजबूत, स्वाभिमानी, अपने कानूनों का निष्पक्षता से पालन करवाने वाले देश के रूप में क्या कभी हम “तनकर खड़े” हों पायेंगे या इतनी युवा आबादी के बावजूद ऐसे ही “घिसटते” रहेंगे…? आखिर इसका निदान कैसे हो…? आप बतायें…

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Krishna Gupta के द्वारा
September 5, 2011

सुरेश जी आपके आलेख बार बार पढने को मन करता है | आप ने जो भी लिखा है उसमें कुछ भी गलत नहीं है | इस्सी वजह से सभी लोग राजनीती से त्रस्त हैं | लोकतंत्र को शायद इस वजह से ही कुछ समाजशास्त्रियों ने सबसे ख़राब व्यवस्था बताया था | क्यों की लोकतंत्र में वोट की खातिर नेता लोग गा….गा…गा..गा….गा….अपनी बेटी तक को बेच सकते हैं | लोकतंत्र पर आपके विचारों की प्रतीक्षा में कृष्ण गुप्ता

Saleem के द्वारा
August 8, 2011

वैसे सुरेश भाई मैंने सबसे पहले हवाला शब्द सुना था जब मैंने बेहद छोटा था और हवाला काण्ड के दोषी लाल कृष्ण आडवानी उनमें से सबसे अव्वल थे ऐसा पढ़ा था !

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
February 21, 2011

इस पराजित मनोवृत्ति का कारण – 1) “नेहरुवादी सेकुलरिज़्म” है? 2) या “मैकाले की गुलाम बनाने वाली शिक्षा” है? 3) या “गाँधीवादी अहिंसा” का नपुंसक बनाने वाला इंजेक्शन है? 4) या अंग्रेजों और मुगलों की गुलामी का असर अब तक नहीं गया है? 5) या कुछ और है? या सभी कारण एक साथ हैं? आपको क्या लगता है…? एक मजबूत, स्वाभिमानी, अपने कानूनों का निष्पक्षता से पालन करवाने वाले देश के रूप में क्या कभी हम “तनकर खड़े” हों पायेंगे या इतनी युवा आबादी के बावजूद ऐसे ही “घिसटते” रहेंगे…? आखिर इसका निदान कैसे हो…? ———————————————————————————————————– क्षमा कीजियेगा, परन्तु जहाँ (जिस देश) के अधिकाँश लोगों की नसों में १. जातिवाद २. स्वार्थपरता ३. बाजारवाद ४. परिवारवाद ५. क्षेत्रवाद ६. गुलाम मानसिकता ७. दुस्चरित्र ८. दिखावा ९. विलासिता जैसे जहर खून की जगह दौड़ते हैं … उन लोगों से आत्मसम्मान की उम्मीद रखना बेकार है …… ———————————————————————————————————- सरकारे नहीं बदल सकती क्योंकि वोट रूपयों में, शराब की थैलियों, भाई भतीजावाद, जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद से मिलता है …….. जो वोट किसे देना चाहिए समझते हैं सिर्फ चिल्लाने आदती हो गए हैं … कुछ करना उनका भी काम नहीं है | ———————————————————————————————————- और नेताओं की मनोवृत्ति ही गंदी वाली है, कि वो स्वयं उससे ऊपर उठ ही नहीं सकते …. इन सब को तलवे चाटने की लत लग गयी है | और जनता भी अपना कर्तव्य अपने अधिकार के लिए कुछ करने वाली नहीं है … उसे भी दो रोटी खाकर पैर पसार कर सो लेने भर से काम है, जनता खुद नेताओं, पाखंडियों के हाथ में कठपुतली की तरह नाचती है | सारे चोर लुटेरे गुंडा नेता बनते हैं तब जनता कहाँ सोती रहती है | राजा ठाकरे , बाल ठाकरे, अरुंधती इत्यादि जैसे संपोलों की पूजा करते है | तो ऐसे जनता से भी कुछ आस रखना स्वयम को धोका देना है |

rahulpriyadarshi के द्वारा
February 20, 2011

हम जड़ हो चुके हैं,चिर निद्रा से जागना ही होगा,आपके आलेख की भूरी भूरी प्रशंसा करता हूँ,ऐसी प्रखर राष्ट्रवादी सोच चहुँ ओर फैले,यही कामना है. अच्छे लेखन की बधाई.

K M Mishra के द्वारा
February 20, 2011

1) “नेहरुवादी सेकुलरिज़्म” है? 2) या “मैकाले की गुलाम बनाने वाली शिक्षा” है? 3) या “गाँधीवादी अहिंसा” का नपुंसक बनाने वाला इंजेक्शन है? सारे कारण एक साथ लागू होते हैं । जिस देश में राष्ट्रवाद को फासीवाद कह कर दुत्कारा जाये । इन नामर्द नेताओं के कुसंग में पड़ कर यहां का युवा निश्चित ही अपना जोश और जवानी खो देगा । 4) या अंग्रेजों और मुगलों की गुलामी का असर अब तक नहीं गया है? सारे कारण एक साथ लागू होते हैं । जिस देश में राष्ट्रवाद को फासीवाद कह कर दुत्कारा जाये । इन नामर्द नेताओं के कुसंग में पड़ कर यहां का युवा निश्चित ही अपना जोश और जवानी खो देगा ।

    शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
    February 21, 2011

    मिश्रा जी इन नेताओं को गली देने से क्या होगा? इन्हें नेता बनाया किसने? हम आप ही ने ना…. तो फिर दोषी तो हम आप ही हुए ना. जनता जनार्दन खुद ही यही चाहती है. ये देश अक्ल के अंधों का है. यहाँ की जनता मूर्ख है ( वाक्य कड़े हैं लेकिन कहना पड़ रहा है). अरबों खरबों के घोटाले हो गए, मंहगाई सुरसा की तरह मुह फाड़ रही है, फिर भी लगता है जनता जनार्दन को सांप सूंघ गया है. ये देश युवाओं का है लेकिन उनकी अक्ल पे पत्थर पड़ गए हैं. सारा दोष जनता का है. आजादी के ६३ साल हो गए हैं, एक पार्टी का अधिकतम शासन रहा है इस देश पे, उस पार्टी की कारगुजारी किसी से छुपी नही है, फिर भी उसी को वोट क्यों? सारा का सारा दोष जनता का है. (माफ़ कीजियेगा मुझे रोष के लिए)

Mala Srivastava के द्वारा
February 20, 2011

जी सर हमको भी ऐसा बहुत बार लगता है की ज़्यादा उदार बनने के फेर में यहाँ के कथित intellectual लोग देश का बहुत नुकसान पंहुचा रहे है ! जब अपना सम्मान खुद से नही होगा तो दूसरा क्यों करेगा ?


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