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भारत के अंतरिक्ष / मिसाइल कार्यक्रम पर सायबर युद्ध का खतरा है?

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कल्पना कीजिये कि पावरग्रिड सिस्टम फ़ेल होने से अचानक पूरे भारत की बिजली गुल हो जाये, सभी प्रमुख बैंकों के सर्वर ठप होने से आर्थिक गतिविधियों में अफ़रातफ़री मच जाये, बाँधों में पानी की क्षमता पर नज़र रखने वाला सिस्टम फ़ेल हो जाये और सभी गेट अपने-आप खुल जायें, हवाई अड्डों पर ट्रेफ़िक नियंत्रण प्रणाली खराब हो जाये और सभी हवाई जहाज आकाश में एक-दूसरे से टकराने लगें… तो इन प्रलयंकारी घटनाओं से किसी देश को तबाह होने में कितना समय लगेगा?

उपरोक्त काल्पनिक घटनाएं मैं आपको डराने के लिये नहीं कह रहा हूं, और न ही भारत के सायबर विशेषज्ञों की क्षमता पर कोई सवाल खड़ा कर रहा हूँ, परन्तु आज जिस तेजी से समूची दुनिया कम्प्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर निर्भर होती जा रही है उसमें ऐसी किसी (कु)संभावना को खारिज़ भी नहीं किया जा सकता। चीन, अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों ने गुप्त रुप से भविष्य में होने वाले “सायबर महायुद्ध” (Cyber War and Third World) की गुपचुप तैयारियाँ काफ़ी पहले शुरु कर दी हैं।

पिछले 1-2 वर्षों में कुछ ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनसे यह शक गहराता जा रहा है कि क्या भारत जैसे देशों की तरक्की में अड़ंगा लगाने के लिये “सीमित सायबर हमले” किये जा रहे हैं? ताज़ा मामला है ईरान के परमाणु संयंत्र का… उल्लेखनीय है कि जब से ईरान ने परमाणु कार्यक्रम हाथ में लिया है तभी से इज़राइल समेत समूचा पश्चिमी विश्व उसे रोकने और उसके इस कार्यक्रम में रुकावटें पैदा करने की लगातार कोशिशें कर रहा है। हालांकि ईरान कह चुका है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ़ ऊर्जा के लिये है (Iran’s Atomic Programme), हथियारों-मिसाइलों के लिये नहीं, पर किसी को भी अहमदीनेजाद पर भरोसा नहीं है। चूंकि ईरान किसी के रोके नहीं रुक रहा और उसे रूस और चीन का मूक समर्थन भी हासिल है तो अब उसके परमाणु कार्यक्रम को पीछे करने और खेल बिगाड़ने के लिये “सायबर युद्ध” का सहारा लिया जा रहा है।

हाल ही में जिस परमाणु संयंत्र से ईरान को सर्वाधिक बिजली उत्पादन मिलने की सम्भावना बनी थी, उस रिएक्टर (Iran’s Nuclear Power Reactor) में कुछ खराबी आ गई। ईरान के वैज्ञानिकों द्वारा गहन जाँच में सामने आया कि पिछली बार और इस बार आई दोनों खराबियों का कारण “बशर परमाणु रिएक्टर” के प्रमुख कम्प्यूटरों में “स्टक्सनेट” (Stuxnet Virus) नामक वायरस है। यह वायरस इस रिएक्टर के नेटवर्क में फ़ैला है और इसने चुन-चुनकर उन्हीं सिस्टम को फ़ेल किया है जो परमाणु रिएक्टर को चालू करने में आवश्यक हैं। इस वायरस की वजह से ईरान का परमाणु कार्यक्रम फ़िर से बाधित हो गया है और इसे चालू करने में अब और देर होगी।

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (IAEA) के सदस्य ईरान में सतत मौजूद रहते हैं और परमाणु रिएक्टरों की निगरानी करते हैं कि कहीं ईरान गुपचुप परमाणु हथियार तो नहीं बना रहा। ईरान ने इन परमाणु इंस्पेक्टरों को बताया है कि निश्चित रुप से कोई बाहरी शक्ति उसके शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम में खलल पैदा कर रही है। रुस ने, जो कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को कच्चा माल सप्लाय कर रहा है, ने इसकी जाँच की माँग की है और कहा है कि यदि यह बात सच निकली तो चेरनोबिल जैसी किसी बड़ी परमाणु दुर्घटना या सीमित परमाणु युद्ध की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। ईरान के बशहर में स्थित इस परमाणु संयंत्र की लागत अब तक 2 अरब डालर तक पहुँच गई है, इसके आसपास एंटी-मिसाइल तकनीक सहित बेहद कड़ी सुरक्षा है, क्योंकि इसे सबसे अधिक खतरा इज़राइल से है। 1979 की इस्लामिक क्रान्ति (Islamic Revolution in Iran) के बाद से ही ईरान परमाणु कार्यक्रम में लगा हुआ है, लेकिन किसी न किसी “कारण” से यह अटकता-टलता जा रहा है। लेकिन Stuxnet वायरस का यह नया पेंच बेहद गम्भीर है और भारत सहित तमाम विकासशील देशों के लिये खतरनाक संकेत भी है।

इस वायरस की शंका गत अक्टूबर में ही ईरानी अधिकारियों को लगी थी, परन्तु उस समय उन्होंने अपने कम्प्यूटरों को वायरस-मुक्त करके इस मुद्दे को अधिक तूल नहीं दिया, परन्तु दिसम्बर और फ़रवरी में जब बार-बार ऐसा हुआ तब उन्होंने विश्व में सभी को इस बारे में बताया।

नॉर्टन (Norton) एंटी-वायरस की कम्पनी सिमाण्टेक (Symantec) ने अपने रिसर्च में पाया कि Stuxnet वायरस का 60% ट्रेफ़िक ईरान की तरफ़ से आ रहा है, 18% इंडोनेशिया की तरफ़ से जबकि 8% भारत की तरफ़ से। इस रिपोर्ट ने भारत के अन्तरिक्ष कार्यक्रम और मिसाइल तकनीक के महारथियों ISRO (Indian Space Research Organization) और DRDO (Defense Research Development Organization) में खलबली मचा दी है। अब इस बात की गम्भीरता से जाँच की जा रही है कि कहीं ISRO एवं DRDO के कम्प्यूटरों में Stuxnet वायरस तो नहीं है? जापान द्वारा यह स्वीकार करने के बाद, कि उसके तीन उपग्रह “अचानक किसी अज्ञात वजह” से खराब हो गये हैं, भारत में भी उच्च स्तर पर यह सोच हावी होने लगी है कि गत जुलाई में INSAT-4B के धराशायी होने के पीछे कहीं Stuxnet वायरस तो नहीं था? सन 2010 के अन्तिम छ्ह माह में चीन, भारत और जापान तीनों देशों को अपने-अपने अन्तरिक्ष कार्यक्रमों में भारी नुकसान सहना पड़ा है, क्या यह मात्र संयोग है? जिस उच्च तकनीक और सुरक्षा के साथ सैटेलाइटों का प्रक्षेपण किया जाता है, और जिन देशों को इसका अनुभव भी हो, उसमें ऐसी किसी दुर्घटना की सम्भावना न के बराबर होती है, फ़िर ऐसा कैसे हुआ कि चीन, जापान और भारत के प्रमुख उपग्रह प्रक्षेपण फ़ेल हो गये? भारत भी विश्व के “उपग्रह बाज़ार” का तेजी से उभरता हुआ खिलाड़ी है और इस तरक्की को रोकने के लिये अमेरिका और चीन किसी भी हद तक जा सकते हैं। वैसे देखा जाये तो इसमें कोई गलत बात भी नहीं है, हर देश चाहेगा कि उसका प्रतिद्वंद्वी अपनी समस्याओं में उलझा रहे और हम उसे कैसे रोकें। यह तो भारत पर निर्भर है कि वह अपने सिस्टम और उपकरणों की सुरक्षा किस प्रकार करता है। (ये और बात है कि हम अपने गाँधीवादी(?) इंजेक्शन की वजह से न तो बांग्लादेश की गर्दन मरोड़ते हैं, न पाकिस्तान को सबक सिखाते हैं, न ही श्रीलंका की स्थिति का फ़ायदा उठाते हैं…)

अप्रैल 2010 में भी ISRO का GSAT-4 नामक संचार उपग्रह नष्ट हो गया था, उससे पहले भी GSLV-D3 नामक रॉकेट प्रक्षेपण फ़ेल हुआ था (ISRO GSLV Launch failed), इस तरह देखा जाये तो 2 साल में तीन प्रमुख उपग्रह/रॉकेट किसी न किसी वजह से फ़ेल हुए हैं, और अब जापान और ईरान की इस आशंका के बाद यह शक गहराना स्वाभाविक है कि भारत के साथ भी कोई “बरबादी का गेम” खेला जा रहा है। छोटे-छोटे देश अपने-अपने उपग्रह को भारत में सस्ती दरों पर प्रक्षेपण करवाना चाहते हैं, बजाय चीन या अमेरिका के महंगी दरों के मुकाबले… और यह उन महाशक्तियों को कैसे रास आ सकता है? कुछ माह पहले ही चीन ने प्रमुख देशों के भारतीय दूतावासों और मंत्रालयों के कम्प्यूटरों में घुसपैठ की थी (Virus Attack by China on Indian Embassy) जिसे चीन समर्थित वामपंथी मीडिया द्वारा दबा दिया गया था। जबकि ईरान के IT मंत्री मोहम्मद लियाई ने साफ़ आरोप लगाया है कि “ईरान के खिलाफ़ सायबर युद्ध छेड़ा गया है… और इसके नतीजे गम्भीर होंगे”। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने इस कारनामे के लिये अमेरिका, ब्रिटेन और इज़राइल पर शक ज़ाहिर किया है। इस झमेले में भारत को जल्दी से जल्दी सबक लेना चाहिये, क्योंकि चीन तो खैर खुल्लमखुल्ला दुश्मन है ही, अमेरिका भी कभी नहीं चाहेगा कि हम अपनी हिम्मत के बल पर “अपने पैरों पर मजबूती” से खड़े हों इसलिये Stuxnet जैसे पता नहीं कितने वायरस उसने भारत के विभिन्न कम्प्यूटर सिस्टमों में छोड़ रखे होंगे… जिनके जरिये तमाम गुप्त जानकारियाँ तो उसे मिलेंगी ही और वक्त पड़ने पर किसी महत्वाकांक्षी उपग्रह या मिसाइल कार्यक्रम में अड़ंगा लगाने में भी आसानी होगी।

पाठकों को शायद याद होगा कि गत वर्ष चीन की सबसे बड़ी दूरसंचार उपकरण बनाने वाली कम्पनी “हुआवै” (Huawei) को भारत सरकार ने बीएसएनएल में प्रतिबन्धित कर दिया था (Huawei banned in BSNL), क्योंकि सुरक्षा एजेंसियों द्वारा जाँच करने पर पाया गया कि देश के विभिन्न शहरों के दूरसंचार दफ़्तरों में जो अरबों रुपये के चीनी सर्वर, सॉफ़्टवेयर और मोडम लगाये जा रहे हैं, उनमें “खास किस्म” के मालवेयर, ट्रोजन और वायरस हैं। ऐसा भी नहीं कि ऐसी आशंका सिर्फ़ भारत को ही हुई हो, इससे पहले अमेरिका और ब्रिटेन की सुरक्षा एजेंसियों और कम्प्यूटर विशेषज्ञों ने पाया कि चीन सरकार और सेना द्वारा समर्थित Huawei कम्पनी पर भरोसा किया जाना मुश्किल है, तथा अमेरिका और ब्रिटेन ने भी इस कम्पनी के बड़े-बड़े सौदे रद्द किये।

संक्षेप में तात्पर्य यह है कि अपने लालच के लिये, अपने फ़ायदे के लिये दूसरों को बरबाद करने और अन्य देशों की अन्दरूनी सूचनाओं को पाने के लिये यह जो “वायरस-वायरस का गंदा खेल” खेला जा रहा है उसके परिणामस्वरूप “अचानक कहीं परमाणु अस्त्र चल जाने” और फ़िर “आत्मघाती तीसरा विश्व युद्ध छिड़ने” जैसे बुरे नतीजे पूरी दुनिया को भी भुगतने पड़ सकते हैं। दूसरों के लिये गढ्ढा खोदने वाला खुद भी उसमें गिरता है यह कहावत सभी देशों और सभी भाषाओं में लागू होती है… सीखना या न सीखना बुद्धिमानों पर निर्भर है…। भारत को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिये कि अमेरिका या ब्रिटेन हमारे दोस्त हैं और न ही इस मुगालते में कि “हम कोई IT या सॉफ़्टवेयर सुपरपावर हैं… भारत की लचीली और लचर सुरक्षा व्यवस्था में ही हमें सुधार करना होगा, महत्वपूर्ण संस्थानों की आंतरिक सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा।

ये बात और है कि जिस महान भारत देश में कोई भी व्यक्ति कहीं से भी घुस सकता है, बरसों तक नागरिक बनकर रह सकता है (बल्कि एक घुसपैठिया सांसद भी बन सकता है), एक ही नाम-पते से 2-4 पासपोर्ट बनवा सकता है, कोई विदेशी व्यक्ति हथियार गिराकर चलता बनता हो, किसी भी सुनसान समुद्री तट पर दुबई में बैठे-बैठे माफ़िया अपने हथियार गाहे-बगाहे उतरवाते रहते हों, बहुराष्ट्रीय और देसी कम्पनियाँ सारे नियम-कानून ताक पर रखकर घातक रसायन बना रही हों, रिश्वतखोरी की चर्बी से सने हुए अधिकारी व नेता बगैर सोचे-समझे, कमीशन के लालच में विदेशी तकनीक और उपकरणों को भारत में बनाने की बजाय, आयात करने में अधिक रुचि रखते हों… वहाँ पर “सायबर सुरक्षा” के बारे में अधिक उम्मीद करना थोड़ा अजीब लगता है…
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